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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ६३ गॉर्डन को भी वही प्रसङ्ग याद आया । बोला, 'यह नही हो सकता चाहे कोई भी राजा या नवाब हो गवर्नर जनरल साहब किसी को इस तरह का उद्दण्ड व्यवहार नही करने देगे । आपका गौरव रखने के लिए ही बनारस वाले उस पीडित को वैसा जवाब दिया गया था, आगे ऐसा न हो सकेगा ।' गङ्गाधरराव के हृदय में शिवराव भाऊ का खून खलबला उठा । कुछ क्षण चुप रहे । बिजली की कोध के समान—दो—एक उत्तर मन में उठे, परन्तु उनको वे क्रोध के कारण प्रकट न कर सके । अन्त मे वे केवल यह कह पाये, 'साहब, मै तो एक छोटा सा संस्थापक हू । तो भी चाहू तो बहुत कुछ कर सकता हू । लेकिन सभी राजाओ ने चूडिया पहिन रक्खी हैं । क्या यह आश्चर्य की बात नही कि अपने ही देश में हम सब कैद हैं ? सवासौ वर्ष पहले की बात याद कीजिये । आप लोगो की क्या शान थी, जब दिल्ली के बादशाह और पूना के पन्तप्रधान के दरबार में साष्टाङ्ग प्रणाम कर करके अर्जिया पेश करते थे ।' राजा थर्राहट के मारे काप उठे । गॉर्डन की व्यापार—कुशल, बुद्धि तुरन्त सजग हुई । उसने मिन्नत सी करते हुये कहा, 'सरकार बुरा न म नें । मैने अपनी ओर से कुछ नही कहा मैने जो कुछ निवेदन किया वह गवर्नर जनरल और कम्पनी सरकार की नीति का आभास मात्र है । पचायतो के बनाये रखने के ही विषय को लीजिये । अनेक अङ्गरेज अफसर उनको सुरक्षित रखना चाहते हैं, परन्तु अधिकांश मत कानून और जाब्ते के बेलन द्वारा हिन्दुस्थान की सारी समतल और ऊवडखावड़ संस्थाओ को चौरस कर डालने के पक्ष में हैं । मेरे ऊपर सरकार की वही कृपा बनी रहे जो सदा से चली आई है । गॉर्डन को यह भी ख़याल था कि यदि राजा ने इस विवाद की सूचना कुछ बढाकर गवर्नर जनरल के पास भेजदी तो अवश्य और नाहक डाट-फटकार पडेगी ।