झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ झांसी की रानी राजा ठडे पड गये। गार्डन के तामझाम से उसका हुक्का मगवाया गया। उसने पिया। फिर राजा ने उसको पान दिया। वह खाकर चला गया। रानी के पास इस विवाद का साराश पहुच गया। वडी प्रसन्न हुई । अपनी सब सहेलियो के सामने कहा, 'आज मे जितनी सुखी हुई उतनी कदाचित ही कभी हुई होऊँ। मुझको शिवराव भाऊ की बहू होने का बहुत घमड है। मुझको अपने राजा का, अपनी झांसी का, अभिमान है। मन को केवल एक कसर खटक रही है-मुझ से और उस गार्डन से बात हुई होती तो मैं ऐसी करकरी सुनाती कि उसको अपने पुरखे याद आजाते। मुझको दादा पेशवा ने बतलाया है कि सौ सवा सौ वर्ष पहले इस अङ्गरेज कौम ने हमारे देश में किन किन उपायो से क्या क्या किया। मेरा वस चले तो......' रानी ने दात पीसे और विशाल नेत्र तरेरे। काशीबाई ने धीरे से कहा, 'सरकार ने कहा था कि बिठूर से वाला गुरू को कुश्ती सीखने के लिये बुलाया जावेगा।' रानी ने तत्क्षण अपनी सहज मुस्कराहट पाली। बोली, 'हां री, उनको शीघ्र बुलवाऊँगी।'