झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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वसन्त आगया । प्रकृति ने पुष्पाञ्जलिया चढाईं । महकें बरसाई । लोगो को अपनी श्वास तक में परिमल का आभास हुआ । किले के महल में रानी ने चैत्र की नवरात्र में गौर की प्रतिमा की स्थापना की । पूजन होने लगा । गौर की प्रतिमा आभूषणो और फूलो के श्रृङ्गार से लदगई और धूप-दीप तथा नैवेद्य ने कोलाहल सा मचा दिया । हरदी कूं कूं (हल्दी कुंकुम) के उत्सव मे सारे नगर की नारिया व्यग्र, व्यस्त होगईं । परन्तु उसमें से बहुत थोडी गले में सुमन-मालाए डाले थी । उनके पास हृदयेश की कविता और उसका फल दूसरे रूप में पहुचा था-उनको भ्रम था कि राजा-रानी हमलोगो के इस श्रृङ्गार को पसन्द नही करते । इसलिये जब वे स्त्रियाँ, जो पूजन के लिये रनवास में आईं-चढाने के लिये तो अवश्य फूल ले आईं परन्तु गले में माला डाले कुछेक ही आईं । किले में जाने की सब जातियो को आज़ादी थी । किले के उस भाग में जहा महादेव और गणेश का मन्दिर है और जिसको शंकर किला कहते थे, सब कोई जासकते थे । अछूत कहलाने वाले चमार, बसोर और भंगी भी । जहा अपने कक्षमे रानी ने गौर को स्थापित किया था, वहाँ इन जातियो की स्त्रिया नही जा सकती थी, परन्तु कोरियो और कुम्हारो की स्त्रिया जासकती थी । कोरी और कुम्हार कभी अछूत नही समझे गये थे । सुन्दर ललनाओ को आभूषण से सजा हुआ देखकर रानी को हर्ष हुआ, परन्तु अधिकांश के गलो में पुष्पमालाओ की त्रुटि उनको खटकी । उन्होने स्त्रियो से कहा, 'तुम लोग हार पहिन कर क्यो नही आई ? गौर माताको क्या अधूरे श्रृङ्गार से प्रसन्न करोगी ?' स्त्रियो के मन में एक लहर उद्वेलित हुई । लाला भाऊ बख्शी की पत्नी उन स्त्रियो की अगुआ बन कर आगे आई । वह यौवन की पूर्णता को पहुच चुकी थी । सौन्दर्य मुखमण्डल पर