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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ६५

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वसन्त आगया । प्रकृति ने पुष्पाञ्जलिया चढाईं । महकें बरसाई । लोगो को अपनी श्वास तक में परिमल का आभास हुआ । किले के महल में रानी ने चैत्र की नवरात्र में गौर की प्रतिमा की स्थापना की । पूजन होने लगा । गौर की प्रतिमा आभूषणो और फूलो के श्रृङ्गार से लदगई और धूप-दीप तथा नैवेद्य ने कोलाहल सा मचा दिया । हरदी कूं कूं (हल्दी कुंकुम) के उत्सव मे सारे नगर की नारिया व्यग्र, व्यस्त होगईं । परन्तु उसमें से बहुत थोडी गले में सुमन-मालाए डाले थी । उनके पास हृदयेश की कविता और उसका फल दूसरे रूप में पहुचा था-उनको भ्रम था कि राजा-रानी हमलोगो के इस श्रृङ्गार को पसन्द नही करते । इसलिये जब वे स्त्रियाँ, जो पूजन के लिये रनवास में आईं-चढाने के लिये तो अवश्य फूल ले आईं परन्तु गले में माला डाले कुछेक ही आईं । किले में जाने की सब जातियो को आज़ादी थी । किले के उस भाग में जहा महादेव और गणेश का मन्दिर है और जिसको शंकर किला कहते थे, सब कोई जासकते थे । अछूत कहलाने वाले चमार, बसोर और भंगी भी । जहा अपने कक्षमे रानी ने गौर को स्थापित किया था, वहाँ इन जातियो की स्त्रिया नही जा सकती थी, परन्तु कोरियो और कुम्हारो की स्त्रिया जासकती थी । कोरी और कुम्हार कभी अछूत नही समझे गये थे । सुन्दर ललनाओ को आभूषण से सजा हुआ देखकर रानी को हर्ष हुआ, परन्तु अधिकांश के गलो में पुष्पमालाओ की त्रुटि उनको खटकी । उन्होने स्त्रियो से कहा, 'तुम लोग हार पहिन कर क्यो नही आई ? गौर माताको क्या अधूरे श्रृङ्गार से प्रसन्न करोगी ?' स्त्रियो के मन में एक लहर उद्वेलित हुई । लाला भाऊ बख्शी की पत्नी उन स्त्रियो की अगुआ बन कर आगे आई । वह यौवन की पूर्णता को पहुच चुकी थी । सौन्दर्य मुखमण्डल पर