भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

६६ झाँसी की रानी छिटका हुआ था । बख्शिनजू कहलाती थी । हाथ जोडकर बोली, 'जब सरकार के गले में माला नही है तब हम लोग कैसे पहिने ?' रानी को असली कारण मालूम था । बख्शिनजू के बहाने पर उनको हँसी आई । पास आकर उसके कन्धे पर हाथ रक्खा और सबको सुनाकर कहने लगी, 'बाहर मालिनें नाना प्रकार के हार गूँथे बैठी हुई हैं । एक मेरे लिये लाओ । मै भी पहनूँगी । तुम सब पहिनो और खूब गागा कर गौर माता को रिझाओ । जो लोग नाचना जानती हो, नाचें । इसके उपरान्त दूसरी-रीति का कार्य होगा ।' स्त्रिया होडाहीसी में मालिनो के पास दौडी, परन्तु मुन्दर पहले माला ले आई । बख्शिन जरा पीछे आई । मुन्दर माला पहिनाने वाली ही थी कि रानी ने उसको मुस्कराकर बरज दिया । मुन्दर सिकुड सी गई । रानी ने कहा 'मुन्दर एक तो तू अभी कुमारी है, दूसरे तेरे हाथ के फूल तो नित्य ही मिल जाते हैं । बख्शिनजू के फूलो का आशीर्वाद लेना चाहती हू ।' बख्शिन हर्षोत्फुल्ल हो गई । मुन्दर को अपने दासीवर्ग की प्रथा का स्मरण हो आया-विवाह होते ही महल और किला छोडना पडेगा, उदास हो गई । रानी समझ गईं । बख्शिन ने पुष्पमाला उनके गले में डालकर पैर छुए । रानी ने उठाकर अङ्क में भर लिया । फिर मुन्दर का सिर पकडकर अपने कन्धे से चिपटा कर उसके कान में कहा, 'पगली, क्यो मन गिरा दिया ? मेरे पास से कभी अलग न होगी ।' मुन्दर उसी स्थिति में हाथ जोडकर धीरे से बोली, 'सरकार, मैं सदा ऐसी ही रहूगी और चरणो मे अपनी देह को इसी दशा में छोड़ूँगी ।' फिर अन्य स्त्रियो ने भी रानी को हार पहिनाये, इतने कि वे ढक गई और उनको सास लेना दूभर होगया । सहेलिया उनके हार उतार- उतार कर रख देती थी और वह पुनः पुनः ढाँक दी जाती थी । अन्त में कोने में खडी हुई एक नववधू माला लिये बढी । उसके कपड़े बहुत रंग-बिरंगे थे । चाँदी के जेवर पहिने थी । सोने का एकाध