भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

लक्ष्मीबाई ६७ ही था । सब ठाठ सोलहआना बुन्देलखण्डो । पैर के पैजनो से लेकर सिर की दाऊनी (दामिनी) तक सब आभूषण स्थानिक । रङ्ग जरा साँवला । बाकी चेहरा रानी की आकृति, आँख-नाक से बहुत मिलता-जुलता ? रानी को आश्चर्य हुआ । और स्त्रियो के मन में काफी कुतूहल । वह डरते डरते रानी के पास आई । रानी ने मुस्कराकर पूछा, 'कौन हो ?' उत्तर मिला, 'सरकार हो तो कोरिन ।' 'नाम ?' 'सरकार. झलकारी दुलैया ।' 'निस्सन्देह जैसा नाम है वैसे ही लक्षण हैं। पहिनादे अपनी माला ।' झलकारी ने माला पहिनादी और रानी के पैर पकड लिये । रानी के हठ करने पर झलकारी ने पैर छोडे । रानी ने उससे पूछा, 'क्या बात है झलकारी ? कुछ कहना चाहती है क्या ?' झलकारी ने सिर नीचा किये हुये कहा, 'मोय जा बिनती करने- मोय माफी मिल जाय तो कम्नो ।' रानी ने मुस्कराकर अभयदान दिया । झलकारी बोली, 'महाराज, मोरे घर में पुरिया पूरवे कौ और कपडा बुनबे कौ काम होत आयो है । पै उनने अब कम कर दओ है । मलखब, कुश्ती और जाने काका करन लगे । अब सरकार घर कैसे चलै ?' रानी ने पूछा, 'तुम्हारी जाति मे और कितने लोग मलखब और कुश्ती में ध्यान देने लगे हैं ?' 'काये मे का घर-घर देखत फिरत ?' झलकारी ने बडी-बडी कजरारी आँखें घुमाकर, मुस्कराकर तीक्ष्ण उत्तर दिया । रानी हँस पडी, 'यह तो तुम्हारे पति बहुत अच्छा काम करते हैं । तुम भी मलखब, कुश्ती सीखो । इनाम दूँगी । घोडे की सवारी भी सीखो ।'