झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 109, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ झांसी की रानी झलकारी लम्बा घूँघट खींचकर नव गई। घूंघट में ही बेतरह हँसी। रानी भी हँसी और अन्य स्त्रियो में भी हँसी का स्रोत फूट पड़ा। लगभग सभी उपस्थित स्त्रियो ने ज़रा चिन्ता के साथ सोचा, 'हम लोगो से भी मलखब, कुश्ती के लिये कहा जावेगा बडी मुश्किल आई।' उन लोगो ने उन फूलो के ढेरो और आभूषणो में होकर अखाडो और कुश्तियो को झाँका तथा परम्परा की लज्जा और सङ्कोच में वे ठिठुर सी गई। उनकी हँसी को एक जकड सी लग गई। झलकारी बोली, 'महाराज, मै चकिया पीसत हो, दो-दो तीन-तीन मटकन में पानी भर-भर लै आउत, राँटा* कातत......' रानी ने कहा, 'तुम्हारे पति का क्या नाम है ?' झलकारी सिकुड गई। बख्शिन ने तपाक से कहा, 'आज हम लोग आपस में कुंकुम रोरी लगाते समय एक दूसरे से पति का नाम पूछेगे ही। झलकारी को भी बतलाना पडेगा उस समय। परन्तु... ...' वह नखरे के साथ दूसरी स्त्रियो की ओर देखने लगी। रानी ने हँसकर पूछा, 'परन्तु क्या बख्शिनजू ?' बख्शिन ने उत्तर दिया, 'सरकार बडे काम पहले राजा से आरम्भ होते हैं। आज के उत्सव की परिपाटी में रिवाज़ के अनुसार सबको अपने अपने पति का नाम लेना पडेगा, परन्तु प्रारम्भ कौन करेगा ? क्या यह भी हम लोगो को बतलाना पडेगा ?' कुछ स्त्रियाँ हँस पडी। कुछ ताली पीटकर थिरक गईं। रानी की सहेलियां मुस्करा-मुस्करा कर उनका मुँह देखने लगी। रानी के गौर मुख पर ऊषा की अरुण स्वर्ण रेखाये सी खिच गईं। वह मुस्कराई जैसे एक क्षण के लिये ज्योत्स्ना छिटक गई हो। जरा सिर हिलाया मानो मुक्त- पवन ने फूलो से लदी फुलवारियो को लहरा दिया हो।
- चरखा। चरखा चलाने की प्रथा बुन्देलखण्ड में, ऊंचे घरानो तक में, 'घर-घर थी।