भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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रानी ने बख्शिन से कहा, 'तुम मुझसे बडी हो, तुमको पहले बत- लाना होगा ।' 'सरकार हमारी महारानी हैं। पहले सरकार बतलावेगी । पीछे हम लोग आज्ञा का पालन करेगी ।' बख्शिन ने घूँघट का एक भाग होठो के पास दबाकर कहा । हरदी कूँ कूँ के उत्सव पर सधवा स्त्रिया एक दूसरे को रोरी का टीका लगाती हैं और उनको किसी न किसी बहाने अपने पति का नाम लेना पडता है । रानी ने कहा, 'बख्शिन जू अपनी बात पर दृढ रहना । आज्ञा पालन में आगा पीछा नही देखा जाता ।' 'परन्तु धर्म की आज्ञा सबके ऊपर होती है सरकार ।' बख्शिन हठ पूर्वक बोली । रानी के गोरे मुख-मडल पर फिर एक क्षण के लिये रक्तिम आभा भाई सी दे गई । बोली, 'बख्शिन जू याद रखना मैं भी बहुत हैरान करूँगी । मेरी बारी आयगी तब मै तुम्हे देखूँगी ।' बख्शिन ने प्रश्न किया, 'अभी तो मेरी बारी है सरकार बतलाइये, महादेव जी के कितने नाँम हैं ।' रानी ने अपने विशाल नेत्र जरा झुकाये । गला साफ किया बोली, 'शिव, शकर, भोलानाथ, शम्भु, गिरिजापति • ' सरकार को पूरा कोष याद है । अब यह बतलाइये कि महादेव जी के जटा जूट में से क्या निकला है ? 'सर्प, रुद्राक्ष • • • ' 'जी नही सरकार—किसकी तपस्या करने पर, किसको महादेव बाबा ने अपनी जटाओ में छिपाया, और कौन वहा से निकलकर हिमा- चल से बहकर इस देश को पवित्र करने के लिये आया ? ब्राह्मावर्त के नीचे किसका महान् सुहावनापन है ?' 'गङ्गा का,' यकायक लक्ष्मीबाई के मुँह से निकल पड़ा ।