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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१०० झाँसी की रानी

उपस्थित स्त्रियाँ हर्ष के मारे उन्मत्त हो उठीं। नाचने लगीं, गाने लगीं। झलकारी ने तो अपने 'बुन्देलखण्डी नृत्य में अपने को विसरा सा दिया। रानी उस प्रमोद में गौर की प्रतिमा की ओर विनीत कृतज्ञता की दृष्टि से देखने लगीं। आमोद की उस थिरकन का वातावरण जब कुछ स्थिर हुआ, रानी ने आनन्द विभोर बख्शिन का हाथ पकडा। कहा, 'बख्शिनजू सावधान हो जाओ। अब तुम्हारी बारी आई।' बख्शिन के मुँह पर गुलाल सा बिखर गया। नत मस्तक होकर बोली, 'सरकार अभी यहाँ वडे वडे मन्त्रियो और दीवानो की स्त्रिया और वहुएँ हैं। हम लोग तो सरकार की सेना के केवल वख्शी ही है।' रानी ने मुस्कराते मुस्कराते दात् पीस कर विशाल नेत्रो को तरेर कर जिनमें होकर मुस्कराहट विवश भरी पड़ रही थी,—कहा, 'वख्शी सेना का आधार, तोपो का मालिक, प्रधान सेनापति के सिवाय और किसी से नीचे नही। राजा के दाहिने हाथ की पहली उङ्गली, और तुम यहा उपस्थित स्त्रियो में सबसे अधिक शरारतिन ! मेरे सवालो का जवाब दो।' बख्शिन ने अपनी मुख मुद्रा पर गम्भीरता क्षोभ और अनमनेपन की छाप विठलानी चाही। परन्तु लाज से बिखेरी हुई चेहरे की गुलाली में से हँसी वरवस फूटी पड रही थी। बख्शिन बोली, 'सरकार की कलाई इतनी प्रवल है कि मेरा हाथ टूटा जा रहा है।' रानी ने कहा, 'तुम्हारी कलाई भी इतनी ही मजबूत बनवाऊँगी, वात न बनाओ। मेरे सवाल का जवाब दो। बोलो मेरे पुरखो के नाम याद हैं ?' बख्शिन सम्भल गई। उसने सोचा मारके का प्रश्न अभी दूर है।' बोली, 'हाँ सरकार। जिनकी सेवा में युग बीत गये उनके नाम हम लोग कैसे भूल सकते हैं ?' 'बतलाओ मेरे ससुर का नाम।' रानी ने मुस्कराते हुये दृढ़तापूर्वक कहा।