झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १०१ चतुर बख्शिन गडबडा गई । उसके मुँह से निकल गया—'भाऊ साहब ।' बख्शिन के पति का नाम लाला भाऊ था । रानी ने हँसकर बख्शिन का हाथ छोड़ दिया । उपस्थित स्त्रिया खिल खिला कर हँस पडी । बख्शिन को अपने पति का नाम बतलाना तो ज़रूर था, परन्तु वह रानी को थोड़ा परेशान करके ही बतलाना चाहती थी, लेकिन रानी ने अनायास ही बख्शिन को परास्त कर दिया । इसके उपरान्त रानी ने चुलबुली झलकारी को बुलाया । उसके पति का वहा किसी को नाम नही मालूम था । इसलिये बहानो की गुन्जाइश न थी । रानी ने सीधे ही पूछा, 'तुम्हारे पति का नाम ?' झलकारी के पति का नाम पूरन था । पति का नाम बतलाने के लिये व्यग्र थी, परन्तु उत्सव की रगत बढाने के लिए उसने जरा सोच विचार कर एक ढग निकाला । बोली, 'सरकार, चन्दा पूरनमासी को ही पूरो पूरी दिखात है न ?' रानी ने हँसकर कहा, 'ओ हो ? पहले ही अरसट्टे मे फिसल गई ! पूरन नाम है ?' झलकारी झेंप गई । चतुराई विफल हुई । हँस पडी । इसी प्रकार हँसते खेलते और नाचते गाते स्त्रियो का वह उत्सव अपने समय पर समाप्त हुआ । अन्त में रानी ने स्त्रियो से एक भीख सी मागी, 'तुममें से कोई बहिनो के बराबर हो, कोई काकी हो, कोई माई, कोई फूफी । फूल सदा नही खिलते । उनमें सुगन्धि भी सदा नही रहती । उनकी स्मृति ही मन में बसती है । नृत्य गान की भी स्मृति ही सुख दायक होती है । परन्तु इन *शिवराव भाऊ गङ्गाधरराव के पिता थे ।