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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१०२ झांसी की रानी सब स्मृतियो का पोषक यह शरीर और इसके भीतर आत्मा है । उनको पुष्ट करो और प्रवल वनाओ ! क्या मुझे ऐसा करने का वचन दोगी ?' उन स्त्रियो ने इस वात को समझा हो, या न समझा हो, परन्तु उन्होने हा-हा की । उन लोगो को डर लगा कि वही और तत्काल, कही मल- खव और कुश्ती न शुरू कर देनी पडे । इत्र पान के उपरान्त चली गई । एक बात लेकिन स्पष्ट थी-जब वे गईं तब वे किसी एक अदृष्ट, अवर्ण्य तेज से ओतप्रोत थी । उसके उपरान्त फिर झाँसी नगर की स्त्रिया संध्या समय थालो में दीपक सजा-सजा कर और गले में बेला, मोतिया, जाही, जुही इत्यादि की फूल-मालाए डाल डाल कर मन्दिरो में जाने लगी । स्त्रियो को ऐसा भान होने लगा जैसे उनका कोई सतत सरक्षण कर रहा हो, जैसे कोई संरक्षक सदा साथ ही रहता हो, जैसे वे अत्याचार का मुकाबला करने की शक्ति का अपने रक्त में सचार पा रही हों।