झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १०३ [ २१ ] नाटकशाला की ओर से गङ्गाधरराव की रुचि कम हो गई । वे महलो में अधिक रहने लगे । परन्तु कचहरी दरबार करना बन्द नही किया । न्याय वे तत्काल करते थे-उल्टा सीधा जैसा समझ में आया, मनमाना । दण्ड उनके कठोर और अत्याचार पूर्ण होते थे, लेकिन स्त्रियो को कभी नही सताते थे । और न किसी की धन सम्पत्ति लूटते थे । झाँसी की जनता उनसे भयभीत थी, परन्तु अपनी रानी पर मुग्ध थी । रानी शासन में कोई प्रत्यक्ष भाग नही लेती थी, किन्तु राजा के कठोर शासन में जहाँ कही दया दिखलाई पडती थी, उसमे जनता रानी के प्रभाव के आभास की कल्पना करती थी । कम्पनी का झाँसी प्रवासी असिस्टेन्ट पोलिटिकल एजेन्ट राजा के कठोर शासन, अत्याचार इत्यादि के समाचार गवर्नर जनरल के पास बराबर भेजता रहता था । उनके किसी भी सत्कार्य का समावेश उन समाचारो में न किया जाता था । और राज्यो के साथ-साथ, कलकत्ते में झाँसी राज्य की भी मिसिल तैयार होती चली जा रही थी । अङ्गरेजो का चौरस करने वाला बेलन बेतहाशा, लगातार और जोर के साथ चल रहा था । अङ्गरेज लोग अपनी दूकान में हिन्दुस्थान को अधूरी या अधकचरी सौदा का रूप लिये नही देख सकते थे । एक कानून, एक जाब्ता, एक मालिक, एक नजर, इसमें अनैक्य को तिल भर भी स्थान देने की गुञ्जायश न थी । मौका मिलते ही छोटे मोटे रजवाड़े साफ हजम ! भारतीय जनता के सुख के लिये !! ऊँचे पदो पर भारतीय पहुँच नही पावे । भारतीय सस्कृति हेच और नाचीज है इसलिये पनपने न पावे । भारत में बहुत फालतू सोना-चाँदी है । इसलिये अङ्गरेजी दूकान की रोकड बढती चली जावे । जनता स्वाधीनता का नाम ले तो उसको बड़ी रियासतो के अन्धेरो का संकेत करके चुप कर दिया जावे । बडी रियासत वाले जरा भी सिर उठावे तो