झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १०५ विषय में बिलकुल तटस्थ हैं—हमारा एकमात्र आदर्श हिन्दुस्थान के लुटेरो और डाकुओ का दमन करके शान्ति स्थापित करने का है, जिससे खेती—किसानी आबाद हो सके और व्यापार बेरोकटोक चल सके। किसका व्यापार ? किसके लिये खेती—किसानी ? उसी अङ्गरेज दूकानदार के लिये । गंगाधरराव यह सब अच्छी तरह नही समझते थे, परन्तु उनके पहले पूना में एक दुबला-पतला व्यक्ति नाना फडनवीस हुआ था। वह खूब समझता था, एक एक नस, एक एक रग, राई-रत्ती ! उसने हिन्दुस्थान के तत्कालीन नेताओ को बहुत समझाया, बहुत सावधान किया, परन्तु वे मूर्ख कुछ न समझे । अपनी महत्वकांक्षाओ की प्रेरणा मे परस्पर कट मरे । अङ्गरेजो ने पञ्जाब को परास्त करके हाल ही में अपने हाथ में किया था। विहार और वगाल में राज्य था ही। मध्य देश बपौती का रूप धारण करता चला जाता था। इनके सबके बीच में दो बडे-बडे रोडे थे—एक अवध की मुसलमानी नवाबी और दूसरी झाँसी की बडी हिन्दू रियासत। ये दोनो किसी प्रकार खतम हो जायें तो पाँचो घी में और फिर हो चौरस करने वाले अङ्गरेजी बेलन की जय ! गंगाधरराव के पास गार्डन और कुछ अन्य अङ्गरेज आया करते थे, परन्तु गार्डन और वे, केवल दोस्ती निभाने नही आया करते थे। गज्य की भीतरी बातो का पता लगाकर गवर्नर जनरल को सूचना देना उनका प्रधान कर्तव्य था। गंगाधरराव के कोई सन्तान उस समय तक नही हुई थी। दूसरा विवाह सन्तान की आकाक्षा से किया था। रानी गर्भवती भी थी, परन्तु यह अनिवार्य नही था कि उनके पुत्र ही उत्पन्न हो। यदि वह निस्सन्तान मर गये तो झासी को तुरन्त अङ्गरेजी राज्य में मिला लिया जावेगा। अङ्गरेजो के अन्तर्मन में यह निहित था। इसीलिये गार्डन इत्यादि गंगाधरराव की खरी-खोटी भी सुन लेते थे। एक दिन शायद आवे जब