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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१०६ झाँसी की रानी झांसी-निवासी हमारी खरी-खोटी चक्रवृद्धि ब्याज के साथ सुनेंगे। भीतर-भीतर यह लालसा घर किये बैठी थी। ठण्ड पडने लगी थी। तारे अधिक चमक-दमक के साथ चन्द्रिका को अपनी विस्तृत झीनी चादर उढाकर आकाश में उपस्थित हुये। गार्डेन और राजा गगाधरराव महल के दीवानखाने में बातचीत कर रहे थे। गगाधरराव—'बाजीराव पन्तप्रधान के देहान्त का समाचार मुझको मिल गया था, परन्तु यह हाल में मालूम हुआ कि उनकी पेंशन जब्त कर ली गई है। यह अच्छा नही किया गया।' गार्डेन—'सोचिये सरकार, आठ लाख रुपया साल कितना होता हे और फिर बिठूर जागीर मुफ्त मे ! उस पर खर्च कुछ नही।' गगाधरराव—'मुझको याद है—मुझको विश्वसनीय लोगो ने बतलाया है कि कम्पनी ने सन् १८०२ मे❊ उक्त पन्तप्रधान के साथ जो सन्धि की थी, उसमें गवर्नर जनरल ने अपने हाथ से लिखा था 'यावच्चन्द्रदिवाकरौ' कायम रहेगी। परन्तु चन्द्रमा और सूर्य सब जहा के तहा हैं। सन्धिपत्र पर दस्तखत किये अभी ५० वर्ष भी नही हुये और सारा मैदान सफाचट कर दिया !' गार्डेन—'सरकार, सन्धिपत्र मेरे सामने नही है, इसलिये ठीक-ठीक नही कह सकता कि उसमें क्या लिखा है, परन्तु सुनता हूँ उनको जब १५, १६ वर्ष पीछे पेंशन दी गई तब यह लिखा था कि पेंशन को वह और उनका कुटुम्ब ही भोग सकेगा।' गंगाधरराव—'नाना धोंडूपन्त जो अब जवान है, पन्तप्रधान का दत्तक पुत्र है। क्या वह उनका कुटुम्बी न माना जावेगा ?' गार्डेन— हमारे देश के कानून में गोद नही मानी जाती।' गगाधरराव—'पर हिन्दुस्थान तो आपका देश नहीं है।' ❊ सन् १८०२ ई० की सन्धि। परिशिष्ठ मे देखिये।