भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 118

लक्ष्मीबाई १०७

गार्डन—'अङ्गरेज कम्पनी का राज्य तो है। राजा अपना कानून बर्तता है न कि प्रजा का। सरकार अपने राज्य में अपना ही कानून तो बर्तते हैं न ?' गंगाधरराव—'हमारा और हमारी प्रजा का कानून तो एक ही है।' गार्डन—'यह बिलकुल ठीक है सरकार। और दीवानी मामलो में हमारे इलाको में भी प्रजा का ही कानून माना और चलाया जाता है, परन्तु रियासतो के सम्बन्ध मे यह बात लागू नही की जाती।' गंगाधरराव—'क्यो, रियासते और उनके रईस क्या साधारण प्रजा से भी गये-बीते है ?' गार्डन—'सो सरकार मै नही जानता। कम्पनी सरकार इङ्गलैंड में कानून बना देती है। कुछ कानून गवर्नर जनरल भी बनाते हैं। हमको उन्ही के अनुसार चलना पडता है।' गंगाधरराव— हमारे धर्म में विधान है कि यदि औरस पुत्र पिडदान देने के लिये न हो तो दत्तक पुत्र ठीक औरस पुत्र की तरह पिंडदान दे सकता है। आप लोग क्या राजाओ को इससे वचित करना चाहते हैं ?' गाडन—'नही सरकार। बडी रियासतो को यह अधिकार दे दिया गया है। परन्तु जो रियासते कम्पनी सरकार की आश्रित है, उनमें गोदी गवर्नर जनरल की स्वीकृति के बिना नही ली जा सकती। यदि ली जावे, तो गोद लिया लडका राज्य की गद्दी का अधिकारी नही माना जा सकता। वह राजा की निजी सम्पत्ति अवश्य पा सकता है और पिंडदान मजे में दे सकता है। सरकार ने हमारे धर्म की पुस्तक पढी। उसका हिन्दी में अनुवाद हो गया है। छप गई है।' गंगाधरराव—'छप गई है अर्थात् ?' गार्डन—'छापाखाना में छपती हैं। उसमे यन्त्र होते हैं। वर्णमाला के अक्षर ढले हुये होते हैं। उनको मिला-मिलाकर स्याही मे कागज पर छाप लेते हैं। हजारो की संख्या में पुस्तके छप जाती हैं।'