भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

१०८ झांसी की रानी गंगाधरराव — ऐ ! यह तो विलक्षण यन्त्र है। मैं ग्रंथों की नकल करवा-करवा कर हैरानी में पडा रहता हू और न जाने कितना रुपया व्यय किया करता हू। एक यन्त्र हमारे लिये भी मँगवा दीजिये।' गार्डन को डर लगा। ऐसा भयंकर विषधर झांसी मे दाखिल किया जावे ! पुस्तके छपेगी, समाचार पत्र निकलेगे। जनता सजग हो जावेगी। अङ्गरेजो का रोब धूल मे मिल जावेगा। जिस आतंक के बल-भरोसे कम्पनी-सरकार राज्य चला रही है, वह हवा मे मिल जावेगा। गार्डन ने सोचा था कि राजा को एक कडवे प्रसग से हटाकर किसी मनोरञ्जक प्रसग में ले जाऊँ, परन्तु यह प्रसग तो और भी अधिक कटु निकला। लेकिन गार्डन ने चतुराई से अपने को बचा लेने का प्रयत्न किया। बोला, 'सरकार, गवर्नर-जनरल की आज्ञा बिना कोई भी उस यन्त्र को नही रख सकता।' गंगाधरराव को रोष हुआ। आश्चर्य भी। बोले, 'इसमें भी गवर्नर जनरल की आज्ञा, अनुमति। आप लोग थोडे दिन मे शायद यह भी कहने लगे कि हमारी आज्ञा बिना पानी भी मत पियो।' गार्डन हँसने लगा। राजा भी हँसे। बात टालने की नियत से उसने कहा, 'सरकार बडी देर से हुक्का नही मिला। आज क्या पान भी न मिलेगा?' राजा ने हुक्का दिया। उसी समय एक हरकारे ने आकर खुगी खुशी कहा, 'महाराज की जय हो ! झांसी राज्य की जय हो। राजा को मालूम था कि रानी प्रसव गृह मे हैं। जय का शब्द सुनते ही समझ गये। भीतर का हर्ष भीतर ही दबाकर गम्भीरता के साथ पूछा, 'क्या बात है?' हरकारा हर्ष के मारे उछला पडता था। उसने हर्षोन्मत्त होकर उत्तर दिया, 'श्रीमन्त सरकार, झांसी को राजकुमार मिले हैं।'