झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० झांसी की रानी [ २२ ] जिस दिन गङ्गाधरराव के पुत्र हुआ उस दिन सम्वत् १९०८ ( सन् १८५१ ) की अगहन सुदी एकादशी थी । यो ही एकादशी के रोज मन्दिरो में काफी चहल पहल रहती थी, उस एकादशी को तो आमोद प्रमोद ने उन्माद का रूप धारण कर लिया । अपनी प्यारी रानी के गर्भ से पुत्र की उत्पत्ति का समाचार सुनकर झासी थोडे समय के लिये इन्द्रपुरी बन गई । राजा ने बहुत खर्च किया, इतना-कि खजाना करीब करीब खाली कर दिया । दरिद्रो को जितना सम्मान उस अवसर पर झासी मे मिला, उतना शायद ही कभी मिला हो । दरबार हुआ । गवैये आये । मुगलखाँ का ध्रुपद सिरे का रहा । उसको हाथी बख्शा गया । नर्तकियो में दुर्गाबाई खूब पुरस्कृत हुई । नाटक हुआ । परन्तु उसमे मोतीबाई न थी । राजा के मन मे आया कि उसको फिर से रगशाला में बुलवा लिया जावे, परन्तु न किसी ने सिफारिश की और न राजा अपने हठ को छोडकर स्वय प्रवृत्त हुये । दरबार मे सभी जागीरदारो को कुछ न कुछ मिला । उस दरबार में केवल एक व्यक्ति अपनी इच्छा की पूर्ति न करा सका । वे थे नवाब अलीबहादुर-राजा रघुनाथराव के पुत्र । जब अङ्गरेजो ने रघुनाथराव के कुशासन काल मे झासी का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया था, तभी उनकी जागीर जब्त कर ली गई थी । और उनको पाच सौ रुपया मासिक पेंशन दी जाने लगी थी । जब गङ्गाधरराव को राज्याधिकार मिला तब उन्होने यह पैन्शन जारी रक्खी । अलीबहादुर चाहते थे कि यथा संभव उनको वही जागीर फिर मिल जावे । जागीर न मिल सके तो पेंशन में काफी वृद्धि कर दी जावे । जागीर मिलती न देखकर अलीबहादुर ने पेंशन बढाने के लिये विनय की । राजा ने पोलिटिकल एजेण्ट से सलाह करने की बात कहकर नवाब को उस समय टाला । नवाब का मन मसोस खा गया । परन्तु उन्होने आशा नही