झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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छोडी । अनेक अङ्ग्रेज अफ़सरों से उनका मेलजोल था, परस्पर आना जाना था। इसलिये उस आश्रय को दृढ़तापूर्वक पकड़ने की उन्होंने अपने जी मे ठानी। दरबार में पगड़ी बंधवाने की प्रथा बहुत समय से चली आ रही थी। श्याम चौधरी नाम के एक सेठ के घराने वाले ही ऐसे मौको पर पगड़ी बाँधते थे। श्याम चौधरी लखपती था। कहते हैं कि उस समय झाँसी में ५२ लखपती थे। ये ५२ घर बावन बसने कहलाते थे। श्याम चौधरी पाग बाँधने के पहले अपना नेग दस्तूर लेने के लिये बहुत मचला। राजा ने जब मोती जड़े सोने के कड़े देने का वचन दिया तब उसने राजा को पगड़ी बाँधी ! नवाब अलीबहादुर का जी इससे और भी अधिक जल गया। वह किसी भी तरह इस भावना को नही दबा पा रहे थे—मै राजा का लड़का हू, मैं ही झाँसी का राजा होता, मेरे पास जागीर तक नहीं ! छोटे-छोटे से लोगो का इतना आदर सत्कार और मेरी पेंशन बढ़ाने तक के लिये पोलिटिकल एजेन्ट की सलाह की जरूरत ! नवाब साहब ऊपर से प्रसन्न और भीतर से बहुत उदास अपनी हवेली को लौट आये। वे रघुनाथराव के नईबस्ती वाले महल मे रहते थे। महल में तीन चौक थे। एक रङ्गमहल, दूसरा सैनिको, हाथियो इत्यादि के लिये तीसरा घोडो और गायो के लिये। महल का सदर दरवाजा चाँद दरवाजा कहलाता था। इस पर चढ़कर वे और उनके मुसलमान अफसर ईद के चाँद को देखते थे, इसलिये दरवाजे का नाम चाँद दरवाजा पड़ गया था। बिलकुल अगले सहन के आगे एक और विस्तृत सहन था। जिसके एक ओर इनका प्रिय हाथी मोती गज बंधता था, और दूसरी ओर राजा रघुनाथराव के जीवनकाल में इनकी माता लच्छोबाई के रहने के लिये हवेली थी। इस समय नवाब अलीबहादुर के अधिकार मे यह हवेली और सारा महल था। बाहर वाली हवेली मे उनके मेहमान या आश्रित ठहराये जाते थे। दरबार से लौटकर अलीबहादुर पहले इसी हवेली में गये।