भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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हवेली बडी थी । उसमे कई कक्ष थे । परन्तु उजाला केवल दो कक्षो में था । बाकी सूनी और अँधेरी थी । बाहर पहरेदार थे । उजाला दीपको का था । शमादानो में जल रहे थे । दो कमरो मे अलग अलग् । दोनो कमरे एक दूसरे से काफी दूर । जिस पहले कमरे में नवाब अलीबहादुर गये उसमें सिवाय खुदाबख्श के और कोई न था । अभिवादन के बाद उनमें बातचीत होने लगी । खुदाबख्श ने आशामयी आँखो से कहा, 'हुजूर ने मेरी विनती तो पेश की ही होगी ?' अलीबहादुर ने उत्तर दिया, 'नही भाई मौका नही आया । जानते हो महाराज अब्बल दर्जे के जिद्दी हैं । एकाध दिन मौका हाथ आने दो, तब कहूँगा ।' खुदाबख्श—'उस कमरे में बिचारी मोतीबाई उम्मेदे बाधे बैठी है । उसका तो कोई कसूर ही नही है । उसके लिये आप कुछ कह सके ?' अलीबहादुर—'क्या कहता ? वहा तो बनियो और छोटे-छोटे लोगो की बन पडी । मेरे लिये ही कुछ नही हुआ ।' खुदाबख्श—'ऐ !' अलीबहादुर—'जी हा । जागीर चूल्हे में गई—पैन्शन बढाने के लिये अर्ज की तो कह दिया कि बडे साहब से सलाह करेगे । मै सोचता हूँ कि हमी लोग बडे साहब से क्यो न मिले ? आपके साथ काफी जुल्म हुआ है । आप मुद्दत से छिपे-छिपे फिर रहे है । जिस मीतीबाई के लिये राजा पलक-पाँवडे बिछाते थे, वह बिचारी दर-दर फिर रही है । एक दिन मुझको यह और राजा के अनेक अत्याचार बडे साहब के सामने साफ बयान करने हैं । आप भी चलना ।' खुदाबख्श—'मैं तो आज तक किसी गोरे से नही मिला । आपकी उनसे दोस्ती है । आप जैसा ठीक समझे करे ।' अलीबहादुर—'मोतीबाई से अर्जी न दिलाई जावे ? आपसे कुछ बातचीत हुई ?'