झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहवेली बडी थी । उसमे कई कक्ष थे । परन्तु उजाला केवल दो कक्षो में था । बाकी सूनी और अँधेरी थी । बाहर पहरेदार थे । उजाला दीपको का था । शमादानो में जल रहे थे । दो कमरो मे अलग अलग् । दोनो कमरे एक दूसरे से काफी दूर । जिस पहले कमरे में नवाब अलीबहादुर गये उसमें सिवाय खुदाबख्श के और कोई न था । अभिवादन के बाद उनमें बातचीत होने लगी । खुदाबख्श ने आशामयी आँखो से कहा, 'हुजूर ने मेरी विनती तो पेश की ही होगी ?' अलीबहादुर ने उत्तर दिया, 'नही भाई मौका नही आया । जानते हो महाराज अब्बल दर्जे के जिद्दी हैं । एकाध दिन मौका हाथ आने दो, तब कहूँगा ।' खुदाबख्श—'उस कमरे में बिचारी मोतीबाई उम्मेदे बाधे बैठी है । उसका तो कोई कसूर ही नही है । उसके लिये आप कुछ कह सके ?' अलीबहादुर—'क्या कहता ? वहा तो बनियो और छोटे-छोटे लोगो की बन पडी । मेरे लिये ही कुछ नही हुआ ।' खुदाबख्श—'ऐ !' अलीबहादुर—'जी हा । जागीर चूल्हे में गई—पैन्शन बढाने के लिये अर्ज की तो कह दिया कि बडे साहब से सलाह करेगे । मै सोचता हूँ कि हमी लोग बडे साहब से क्यो न मिले ? आपके साथ काफी जुल्म हुआ है । आप मुद्दत से छिपे-छिपे फिर रहे है । जिस मीतीबाई के लिये राजा पलक-पाँवडे बिछाते थे, वह बिचारी दर-दर फिर रही है । एक दिन मुझको यह और राजा के अनेक अत्याचार बडे साहब के सामने साफ बयान करने हैं । आप भी चलना ।' खुदाबख्श—'मैं तो आज तक किसी गोरे से नही मिला । आपकी उनसे दोस्ती है । आप जैसा ठीक समझे करे ।' अलीबहादुर—'मोतीबाई से अर्जी न दिलाई जावे ? आपसे कुछ बातचीत हुई ?'