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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ११३ खुदाबख्श—'क्या कहूँ, वे तो मुझ से पर्दा करती हैं। आप ही पूछियेगा।' अलीबहादुर—'नाटकशाला वाली भी पर्दा करती है। रङ्गमञ्च पर तो पर्दे का नाम-निशान नही रहता, बल्कि उससे बिलकुल उलटा व्योहार नजर आता है।' अलीबहादुर की अवस्था ४२, ४३ वर्ष की थी। स्वस्थ थे। रङ्गीन तबियत के। उन्होने बातचीत का सिलसिला जारी रक्खा— रङ्गमञ्च पर उनका नाचना, गाना, हावभाव सभी पहले सिरे के देखे। यहाँ पर्दा कैसा वे पीरअली के सामने तो निकलती हैं।' पीरअली अलीबहादुर का खास नौकर और सिपाही था। वनवि एकान्त में मित्रो सदृश। उसको बुलवाया गया। पीरअली की मारफत मोतीबाई से बातचीत होने लगी। 'बडे साहब' को अर्जी देने के प्रस्ताव पर मोतीबाई ने कहलवाया, 'मैं अर्जी नही देना चाहती हूँ। किसी अङ्गरेज के सामने नही जाऊँगी। आप लोग बडे आदमी हैं। आप लोगो के रहते में अङ्गरेजो के बंगलो पर नही भटकना चाहती।' अलीबहादुर ने कहा, 'आपको कही जाना नही पडेगा। आपकी अर्जी मै पेश कर आऊँगा।' मोतीबाई ने उत्तर दिलवाया, 'साहब से सब कुछ जबानी कह दीजिये लिखी अर्जी नही दूँगी।' खुदाबख्श ने समर्थन किया। बोला, 'लिखा हुआ कुछ नही देना चाहिये। यदि कही अर्जी को साहब ने महाराज के पास फैसले के लिये भेज दिया तो हम सब विपद में पड जावेंगे।' अलीबहादुर दूसरे के हाथ से अङ्गारे डलवाना चाहते थे इसलिये उन्होने खुदाबख्श को समझाया, 'आपका इससे बढकर तो अब और