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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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११४ झांसी की रानी

कुछ नुकसान हो नही सकता। बिना किसी अपराध के देश-निकाला दे दिया गया। घर-द्वार छूटा। जागीर गई। परदेश की खाक छानते फिर रहे हो। मेरी राय में आपको लिखी अर्जी जरूर देनी चाहिये। मैं साहब से सिफारिश करूँगा। वे राजा के पास न भेजकर सीधी लाट साहव गवर्नर-जनरल बहादुर के पास भेज देगे। कम्पनी सरकार रियासतो के नुक्स तलाश करने में दिन-रात व्यस्त रहती है।' खुदाबख्श ने कहा, 'जरा सोच लूँ। फिर किसी दिन अर्ज करूँगा। आप तो मेरे शुभचिन्तक हैं। आप अकेले का तो मुझको आधार ही है। अहसानो के बोझ से दबा हूँ।' अलीबहादुर ने सोचा जल्दी न करनी चाहिये। पीरअली ने छिपे सकेत में हामी भरी। खुदाबख्श के खाने-पीने की व्यवस्था करके अलीबहादुर चले गये। अकेले रह जाने पर मोतीबाई भी अपने घर गई। जाते समय उसने एक बार खुदाबख्श की ओर देखा। खुदाबख्श को ऐसा जान पडा जैसे कमलो का परिमल छुटकाती गई हो।