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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ११५ [ २३ ] लक्ष्मीबाई का बच्चा लगभग दो महीने का हो गया। परन्तु वे सिवाय किले के उद्यान में टहलने के और कोई व्यायाम नही कर पाती थी। शरीर अभी पूरी तौर पर स्वस्थ नही हुआ था। मन उनका सुखी था। लगभग सारा समय बच्चे के प्यार में जाता था। राजा भी उस बच्चे पर प्यार बरसाने में काफी समय उनके पास विताते थे। राजा की प्रकृति में अद्भुत अन्तर आगया था। शासन की कठोरता में उन्होने कमी करदी। जनता उनको प्रजावत्सल कहने लगी। उन्हीं दिनो तात्या टोपे झाँसी आया। राजा का एक फौजी अफसर कर्नल मुहम्मद जमाखाँ था। उसी की हवेली के एक हिस्से मे तात्या को डेरा मिला। पास ही जूही रहती थी। तात्या को रानी से एकान्त में बात चीत करने का अवसर मिला। उसने रानी से कहा, 'आपको दादा के देहान्त का हाल तो मालूम हो गया था, परन्तु पेन्शन छीने जाने की बात किसी ने नही बतलाई ! आश्चर्य है। लक्ष्मीबाई दुखी स्वर में बोली, 'मै अस्वस्थ थी, इसलिये यह समाचार मुझ तक नही आने दिया गया। अङ्गरेजो ने बडी बेईमानी की।' तात्या—'यह उन लोगो की न तो पहली बेईमानी है और न आखरी। उन लोगो की नीति सारे देश को डसती चली जा रही है। गायकवाड, होलकर, सिंधिया, अवध के नवाब ये सब अफीम ही खाये बैठे हैं।' रानी—'पैन्शन छीनने के विरुद्ध क्या उपाय किया ?' तात्या—'अर्ज़ी फरियाद की। वडे लाट ने कोई सुनाई नही की। विलायत को भी लिखा पढा, एक होशियार आदमी भेजा, परन्तु सबने कानो में तेल डाल लिया है।' रानी—'फिर क्या सोचा है ?' तात्या—'कुछ नही। नाना साहब और रावसाहब ने आपके पास मुझको भेजा है। उनको आपके विवेक और तेज का भरोसा है।'