भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 127

११६ झाँसी की रानी रानी — 'नवाब साहब के पास लखनऊ गये ?' तात्या—'गया था। परन्तु नवाब साहब के चारो तरफ गायिकाओ नर्तकियो और भाडो का पहरा लगा रहता है। उन लोगो ने कहा कि अगले साल मुलाकात का मुहूर्त निकलेगा।' रानी हँस पडी। जैसे सन्ध्या के पीछे बादलो मे दामिनी दमक गई हो। रानी ने अभी अपनी स्वाभाविक अरुणता पुन प्राप्त न कर पाई थी। तात्या ने कहा, 'मै नवाब के प्रधान मन्त्री से मिला वह हिन्दू है। परन्तु विचारा क्या करता। उसने अपनी असमर्थता प्रकट की। फिर कई बडे जिमीदारो से मिला। उन्होने कहा, कि कुछ पुरुषार्थ करो हम साथ देगे। रानी कुछ सोचने लगी। सोचती रही। तात्या बोला, 'आप बिठूर में छत्रपति और बाजीराव और छत्रसाल, न जाने कितने नाम लिया करती थी।' रानी ने कहा, ये नाम मै कभी नही भूलूगी। छत्रसाल का नाम इधर के लोगो में अब भी मन्त्र का सा काम करता है।' तात्या—'यह और वे सब मन्त्र कब काम आवेगे ?' रानी जरा मुस्कराई। तात्या उस मुस्कराहट को पहचानता था। उसके परिवेष्ठन में छुटपन की मनू के छोटे छोटे निश्चय बडी दृढता के साथ निकला करते थे। तात्या ने आशा से कान लगाये। रानी ने कहा, 'टोपे अभी समय नही आया है। घडा अपूर्ण है— अभी भरा नही है। हम लोगो के आपसी उपद्रवो ने जनता को त्रस्त कर दिया है। उसको थोडा सांस लेने योग्य बन जाने दो। समर्थ रामदास का दिया हुआ स्वराज्य संदेश, छत्रपति शिवाजी का पाला हुआ वह आदर्श, छत्रसाल का वह अनुशीलन अमर और अक्षय है। तात्या जरा अधीर होकर बोला, 'महारानी साहब, ये बाते कान और हृदय को अच्छी मालूम होती हैं, पर हिन्दू और मुसलमान जनता तो अचेत सी जान पडती है...'