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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ११७ रानी ने टोककर दृढ़ स्वर में कहा, 'तात्या भाई, जनता कभी अचेत नही होती, उसके नायक अचेत या भ्रम मय हो जाते हैं।' तात्या—'तब नाना साहब से क्या जाकर कहूँ?' रानी—'यही कि कान और आँख खोलकर समय की प्रतीक्षा करे। मुझे अभी तो पूर्ण स्वस्थ होने में ही कुछ समय लगेगा, स्वस्थ होते ही अपने आदर्श के पालन में सचेष्ट होऊँगी। अपने आदर्श को कभी न भूलना—प्रयत्न की पहली और पक्की सीढ़ी है। तात्या चलने को हुआ। रानी ने प्रश्न किया, 'दिल्ली का क्या हाल है?' तात्या ने उत्तर दिया, 'बादशाह का? उन बिचारो को नब्बे हज़ार रुपया साल पेन्शन मिलती है। कविता करते हैं और कवि सम्मेलनो में उलझे रहते हैं। कम्पनी ने उनकी नजर भेट बन्द करदी है और उनसे कह रही है कि अपने को बादशाह कहना छोड़ो नही तो पेन्शन बन्द कर देगे।' रानी ने कहा, 'मुसलमान नवाब और जन क्या इस चुनौती को यो ही पी जायेगे?' 'कह नही सकता' तात्या ने कहा। कुछ समय बाद तात्या चला गया। तात्या झांसी में और ठहरना चाहता था, परन्तु बिठूर जल्दी जाना था और गङ्गाधरराव की नाटकशाला बन्द थी। यद्यपि अभिनय करने वालो का वेतन बन्द नही किया गया था।