भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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११८ झांसी की रानी [ २४ ] । गङ्गाधरराव का यह बच्चा तीन महीने की आयु पाकर मर गया । इसका सभी के लिये दुःखद परिणाम हुआ । राजा के मन और तन पर इस दुर्घटना का स्थाई कुप्रभाव पड़ा । वे बराबर अस्वस्थ रहने लगे । लगभग दो वर्ष राजा और रानी के काफी कष्ट मे बीते । राजा की खीझ बढ़ गई । उन्होने सनको में काम करना शुरू कर दिया । एक दिन उनको मालूम हुआ कि खुदाबख्श नवाब अलीबहादुर के यहा कभी कभी आता है इस जरा से अपराध पर उन्होने नवाब साहब का महल जब्त कर लिया । केवल बाहर वाली हवेली उनके रहने के लिये छोडी । सन् १८४३ के शारदीय नवरात्र का महोत्सव हुआ । उस दिन उनका स्वास्थ्य अच्छा जान पडता था, केवल कुछ कमजोरी थी । राजवैद्य प्रतापशाह मिश्र का उपचार था । राजा वैद्य पर बहुत खुश थे । वैद्य उद्दण्ड प्रकृति का था, परन्तु राजा उसको बहुत निभाते थे । दशहरे के भरे दरबार में वैद्य ने अपने एक पडोसी का उलाहना दिया, 'सरकार मै हवेली बनाना चाहता हू । मेरे मकान मे जगह थोडी है । पडोसी को मुँहमागा दाम देने को तैयार हू । वह पाजी है । बिल्कुल नठ गया है । मकान नही छोडता । मेरी हवेली नही बन पा रही है । वह मकान मुझको दिलवा दिया जाय ।' राजा ने इस प्रार्थना को स्वीकृत करने से इनकार कर दिया । वैद्य ने हठपूर्वक कहा, 'तब मै कोट बाहर एक अलग छोटी सी झाँसी बसाऊँगा । सरकार की अनुमति भर चाहिये । या तो नगर में हवेली बनाकर रहूगा या कोट बाहर एक बस्ती बसाऊगा और एक दृढ़ कोट उसके चारो ओर खिचवा दूँगा । तीन साल पहले के गङ्गाधरराव होते तो वह इस प्रस्ताव पर वैद्य- राज की खाल खिचवा डालते । परन्तु उनका स्वभाव सनको से भर गया था । बल के साथ तेज भी उनका ठंडा पड गया था ।