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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 526 में से

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लक्ष्मीबाई ११६ राजा ने वैद्य को अनुमति दे दी। वैद्य का ध्यान उपचार से हटकर नया नगर बसाने और कोट खिचवाने की विशाल मूर्खता पर दृढ़ता के साथ जा अटका। नईबस्ती तो वैद्य ने नही बसा पाई, परन्तु उसने कोट खिचवा लिया, जो अपने अखण्ड रूप में अब भी प्रतापसाह मिश्र के हठ का स्मारक बडेगाँव फाटक बाहर खडा है। विजयादशमी के उपरान्त गगाधरराव को सग्रहणी रोग ने ग्रस लिया। बहुत दवा-दारू की गई कुछ न हुआ। मर्ज बढता ही चला गया। उस समय झाँसी का असिस्टेट पोलिटिकल एजेंट मेजर मालक्रम था। उसको सूचना दी गई। उसने डाक्टरी उपचार का अनुरोध किया परन्तु वैद्यो और हकीमो ने प्रयत्न को अभी आशा रहित नही समझा था, इसलिये उस अनुरोध पर विचार करने की भी नौबत नही आई। महालक्ष्मी के मन्दिर में जो लक्ष्मी फाटक बाहर है और जहा सदा ही धूमधाम रहती थी, पाठ बिठलाया गया। झाँसी का कोई भी मन्दिर न था जहा राजा के रोग निवारण के लिये पूजा-अर्चा न कराई गई हो और जनता ने अपनी प्रार्थनाये भेट न की हो। नवम्बर के तीसरे सप्ताह में राजा का स्वास्थ्य और भी बहुत बिगड गया। प्रतापसाह मिश्र ने बडे दम्भ के साथ 'प्रतापलकेश्वर रस' बनाया, परन्तु किसी भी रस का कोई प्रभाव न पडा। राजा ने क्षीण मुस्कराहट के साथ इतना जरूर कहा, 'कोट खिचवाने से कैसे अवकाश मिल गया ?' उसके बाद राजा यकायक बेहोश हो गये। रानी के पिता मोरोपन्त और दीवान नरसिंहराव घबराये हुये आये। राजा को पुन चेत हो आया था। नरसिंहराव ने कहा, 'सरकार स्वस्थ हो जावेगे। कोई चिन्ता की बात नही है। हम लोगो को आज्ञा दी जावे।'

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