झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई ११५ [ २३ ] लक्ष्मीबाई का बच्चा लगभग दो महीने का हो गया। परन्तु वे सिवाय किले के उद्यान में टहलने के और कोई व्यायाम नही कर पाती थी। शरीर अभी पूरी तौर पर स्वस्थ नही हुआ था। मन उनका सुखी था। लगभग सारा समय बच्चे के प्यार में जाता था। राजा भी उस बच्चे पर प्यार बरसाने में काफी समय उनके पास विताते थे। राजा की प्रकृति में अद्भुत अन्तर आगया था। शासन की कठोरता में उन्होने कमी करदी। जनता उनको प्रजावत्सल कहने लगी। उन्हीं दिनो तात्या टोपे झाँसी आया। राजा का एक फौजी अफसर कर्नल मुहम्मद जमाखाँ था। उसी की हवेली के एक हिस्से मे तात्या को डेरा मिला। पास ही जूही रहती थी। तात्या को रानी से एकान्त में बात चीत करने का अवसर मिला। उसने रानी से कहा, 'आपको दादा के देहान्त का हाल तो मालूम हो गया था, परन्तु पेन्शन छीने जाने की बात किसी ने नही बतलाई ! आश्चर्य है। लक्ष्मीबाई दुखी स्वर में बोली, 'मै अस्वस्थ थी, इसलिये यह समाचार मुझ तक नही आने दिया गया। अङ्गरेजो ने बडी बेईमानी की।' तात्या—'यह उन लोगो की न तो पहली बेईमानी है और न आखरी। उन लोगो की नीति सारे देश को डसती चली जा रही है। गायकवाड, होलकर, सिंधिया, अवध के नवाब ये सब अफीम ही खाये बैठे हैं।' रानी—'पैन्शन छीनने के विरुद्ध क्या उपाय किया ?' तात्या—'अर्ज़ी फरियाद की। वडे लाट ने कोई सुनाई नही की। विलायत को भी लिखा पढा, एक होशियार आदमी भेजा, परन्तु सबने कानो में तेल डाल लिया है।' रानी—'फिर क्या सोचा है ?' तात्या—'कुछ नही। नाना साहब और रावसाहब ने आपके पास मुझको भेजा है। उनको आपके विवेक और तेज का भरोसा है।'
११६ झाँसी की रानी रानी — 'नवाब साहब के पास लखनऊ गये ?' तात्या—'गया था। परन्तु नवाब साहब के चारो तरफ गायिकाओ नर्तकियो और भाडो का पहरा लगा रहता है। उन लोगो ने कहा कि अगले साल मुलाकात का मुहूर्त निकलेगा।' रानी हँस पडी। जैसे सन्ध्या के पीछे बादलो मे दामिनी दमक गई हो। रानी ने अभी अपनी स्वाभाविक अरुणता पुन प्राप्त न कर पाई थी। तात्या ने कहा, 'मै नवाब के प्रधान मन्त्री से मिला वह हिन्दू है। परन्तु विचारा क्या करता। उसने अपनी असमर्थता प्रकट की। फिर कई बडे जिमीदारो से मिला। उन्होने कहा, कि कुछ पुरुषार्थ करो हम साथ देगे। रानी कुछ सोचने लगी। सोचती रही। तात्या बोला, 'आप बिठूर में छत्रपति और बाजीराव और छत्रसाल, न जाने कितने नाम लिया करती थी।' रानी ने कहा, ये नाम मै कभी नही भूलूगी। छत्रसाल का नाम इधर के लोगो में अब भी मन्त्र का सा काम करता है।' तात्या—'यह और वे सब मन्त्र कब काम आवेगे ?' रानी जरा मुस्कराई। तात्या उस मुस्कराहट को पहचानता था। उसके परिवेष्ठन में छुटपन की मनू के छोटे छोटे निश्चय बडी दृढता के साथ निकला करते थे। तात्या ने आशा से कान लगाये। रानी ने कहा, 'टोपे अभी समय नही आया है। घडा अपूर्ण है— अभी भरा नही है। हम लोगो के आपसी उपद्रवो ने जनता को त्रस्त कर दिया है। उसको थोडा सांस लेने योग्य बन जाने दो। समर्थ रामदास का दिया हुआ स्वराज्य संदेश, छत्रपति शिवाजी का पाला हुआ वह आदर्श, छत्रसाल का वह अनुशीलन अमर और अक्षय है। तात्या जरा अधीर होकर बोला, 'महारानी साहब, ये बाते कान और हृदय को अच्छी मालूम होती हैं, पर हिन्दू और मुसलमान जनता तो अचेत सी जान पडती है...'
लक्ष्मीबाई ११७ रानी ने टोककर दृढ़ स्वर में कहा, 'तात्या भाई, जनता कभी अचेत नही होती, उसके नायक अचेत या भ्रम मय हो जाते हैं।' तात्या—'तब नाना साहब से क्या जाकर कहूँ?' रानी—'यही कि कान और आँख खोलकर समय की प्रतीक्षा करे। मुझे अभी तो पूर्ण स्वस्थ होने में ही कुछ समय लगेगा, स्वस्थ होते ही अपने आदर्श के पालन में सचेष्ट होऊँगी। अपने आदर्श को कभी न भूलना—प्रयत्न की पहली और पक्की सीढ़ी है। तात्या चलने को हुआ। रानी ने प्रश्न किया, 'दिल्ली का क्या हाल है?' तात्या ने उत्तर दिया, 'बादशाह का? उन बिचारो को नब्बे हज़ार रुपया साल पेन्शन मिलती है। कविता करते हैं और कवि सम्मेलनो में उलझे रहते हैं। कम्पनी ने उनकी नजर भेट बन्द करदी है और उनसे कह रही है कि अपने को बादशाह कहना छोड़ो नही तो पेन्शन बन्द कर देगे।' रानी ने कहा, 'मुसलमान नवाब और जन क्या इस चुनौती को यो ही पी जायेगे?' 'कह नही सकता' तात्या ने कहा। कुछ समय बाद तात्या चला गया। तात्या झांसी में और ठहरना चाहता था, परन्तु बिठूर जल्दी जाना था और गङ्गाधरराव की नाटकशाला बन्द थी। यद्यपि अभिनय करने वालो का वेतन बन्द नही किया गया था।
११८ झांसी की रानी [ २४ ] । गङ्गाधरराव का यह बच्चा तीन महीने की आयु पाकर मर गया । इसका सभी के लिये दुःखद परिणाम हुआ । राजा के मन और तन पर इस दुर्घटना का स्थाई कुप्रभाव पड़ा । वे बराबर अस्वस्थ रहने लगे । लगभग दो वर्ष राजा और रानी के काफी कष्ट मे बीते । राजा की खीझ बढ़ गई । उन्होने सनको में काम करना शुरू कर दिया । एक दिन उनको मालूम हुआ कि खुदाबख्श नवाब अलीबहादुर के यहा कभी कभी आता है इस जरा से अपराध पर उन्होने नवाब साहब का महल जब्त कर लिया । केवल बाहर वाली हवेली उनके रहने के लिये छोडी । सन् १८४३ के शारदीय नवरात्र का महोत्सव हुआ । उस दिन उनका स्वास्थ्य अच्छा जान पडता था, केवल कुछ कमजोरी थी । राजवैद्य प्रतापशाह मिश्र का उपचार था । राजा वैद्य पर बहुत खुश थे । वैद्य उद्दण्ड प्रकृति का था, परन्तु राजा उसको बहुत निभाते थे । दशहरे के भरे दरबार में वैद्य ने अपने एक पडोसी का उलाहना दिया, 'सरकार मै हवेली बनाना चाहता हू । मेरे मकान मे जगह थोडी है । पडोसी को मुँहमागा दाम देने को तैयार हू । वह पाजी है । बिल्कुल नठ गया है । मकान नही छोडता । मेरी हवेली नही बन पा रही है । वह मकान मुझको दिलवा दिया जाय ।' राजा ने इस प्रार्थना को स्वीकृत करने से इनकार कर दिया । वैद्य ने हठपूर्वक कहा, 'तब मै कोट बाहर एक अलग छोटी सी झाँसी बसाऊँगा । सरकार की अनुमति भर चाहिये । या तो नगर में हवेली बनाकर रहूगा या कोट बाहर एक बस्ती बसाऊगा और एक दृढ़ कोट उसके चारो ओर खिचवा दूँगा । तीन साल पहले के गङ्गाधरराव होते तो वह इस प्रस्ताव पर वैद्य- राज की खाल खिचवा डालते । परन्तु उनका स्वभाव सनको से भर गया था । बल के साथ तेज भी उनका ठंडा पड गया था ।
लक्ष्मीबाई ११६ राजा ने वैद्य को अनुमति दे दी। वैद्य का ध्यान उपचार से हटकर नया नगर बसाने और कोट खिचवाने की विशाल मूर्खता पर दृढ़ता के साथ जा अटका। नईबस्ती तो वैद्य ने नही बसा पाई, परन्तु उसने कोट खिचवा लिया, जो अपने अखण्ड रूप में अब भी प्रतापसाह मिश्र के हठ का स्मारक बडेगाँव फाटक बाहर खडा है। विजयादशमी के उपरान्त गगाधरराव को सग्रहणी रोग ने ग्रस लिया। बहुत दवा-दारू की गई कुछ न हुआ। मर्ज बढता ही चला गया। उस समय झाँसी का असिस्टेट पोलिटिकल एजेंट मेजर मालक्रम था। उसको सूचना दी गई। उसने डाक्टरी उपचार का अनुरोध किया परन्तु वैद्यो और हकीमो ने प्रयत्न को अभी आशा रहित नही समझा था, इसलिये उस अनुरोध पर विचार करने की भी नौबत नही आई। महालक्ष्मी के मन्दिर में जो लक्ष्मी फाटक बाहर है और जहा सदा ही धूमधाम रहती थी, पाठ बिठलाया गया। झाँसी का कोई भी मन्दिर न था जहा राजा के रोग निवारण के लिये पूजा-अर्चा न कराई गई हो और जनता ने अपनी प्रार्थनाये भेट न की हो। नवम्बर के तीसरे सप्ताह में राजा का स्वास्थ्य और भी बहुत बिगड गया। प्रतापसाह मिश्र ने बडे दम्भ के साथ 'प्रतापलकेश्वर रस' बनाया, परन्तु किसी भी रस का कोई प्रभाव न पडा। राजा ने क्षीण मुस्कराहट के साथ इतना जरूर कहा, 'कोट खिचवाने से कैसे अवकाश मिल गया ?' उसके बाद राजा यकायक बेहोश हो गये। रानी के पिता मोरोपन्त और दीवान नरसिंहराव घबराये हुये आये। राजा को पुन चेत हो आया था। नरसिंहराव ने कहा, 'सरकार स्वस्थ हो जावेगे। कोई चिन्ता की बात नही है। हम लोगो को आज्ञा दी जावे।'
२. गंगाधर राव का देहावसान, डलहौजी का हड़प सिद्धान्त एवं झाँसी का स्वाभिमान
१२० झांसी की रानी राजा समझ गए। कुछ पहले से मनमें जो बात उठी थी, उसको उन्होने कहा, 'मैं अभी जिऊँगा। प्रताप मिश्र का नया नगर देखने जाऊँगा परन्तु मैंने निश्चय किया है कि दत्तक ले लूँ।' मोरोपन्त और नरसिंहराव राजा के मुह की ओर देखने लगे। राजा कहते गये, 'हमारे कुटुम्बी वासुदेवराव नेवालकर का एक पुत्र आनन्दराव है। पाच वर्ष का है। सुन्दर और होनहार है। उसको मैं गोद लेना चाहता हू। यदि रानी साहब स्वीकार करे तो मै आज ही शास्त्रानुसार गोद ले लूं।' मोरोपन्त पूछ आये। रानी ने स्वीकार किया। तुरन्त दत्तक विधान की तैयारी की गई। नगर की जनता के मुखिया निमंत्रित किये गये। मेजर मालकम की जगह मेजर एलिस असिस्टेंट पोलिटिकल एजेंट होकर आ गया था और मालकम पोलिटिकल एजेंट होकर चला गया था, उसको तथा अङ्गरेजी सेना के अफसर कप्तान मार्टिन को भी बुलाया गया। इन सबके सामने राजा ने आनन्दराव को विधिवत् गोद लिया। ˇ आनन्दराव का नाम बदलकर दामोदरराव रक्खा गया।
लक्ष्मीबाई १२१ [ २५ ] झासी की जनता के पञ्चो, सरदारो, और सेठ साहूकारो को जो इस उत्सव पर निमन्त्रित किये गये थे, इत्र पान भेट इत्यादि से सम्मानित करके विदा किया गया । केवल मेजर एलिस, कप्तान मार्टिन, मोरोपन्त और—प्रधान मन्त्री नरसिंहराव वहा रह गए । निकट ही पर्दे के पीछे रानी लक्ष्मीबाई बैठी हुई थी । राजा ने एक खरीता कम्पनी सरकार के नाम लिखवाया । उसका सार यह है:— 'बुन्देलखण्ड मे कम्पनी सरकार का राज्य स्थापित होने के पहले से हमारे पूर्वज उनकी हर तरह की सहायता करते आये हैं और मैंने स्वय जीवन भर उनकी सहायता की है । मेरे घराने के साथ कम्पनी सरकार की जो संघिया समय समय पर हुई हैं, उनसे हमारा हक बराबर पुष्ट होता चला आया है । मैं इस समय रोग ग्रस्त हू । अच्छे होने की आशा है और यह भी आशा है कि स्वस्थ होने पर मेरे सन्तान हो, परन्तु यह सोच कर कि कदाचित् मेरा देहान्त हो जाय और बिना उत्तराधिकारी के यह राज्य नष्ट हो जाय, अपने कुटुम्ब के एक पञ्चवर्षीय बालक आनन्दराव को हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार गोद लिया है । वह नाते में मेरा पौत्र लगता है । यदि मै स्वस्थ न हो सका और मेरा देहान्त हो गया तो यही बालक, जिसका नाम गोद के उपरान्त दामोदरराव रक्खा गया है, झासी राज्य का उत्तराधिकारी होगा । जब तक मेरी पत्नी जीवित रहे, तब तक इस राज्य की स्वामिनी और इस बालक की माता समझी जावे और राज्य की व्यवस्था उसी के आधीन रहे । मैं चाहता हू कि उसको किसी प्रकार का कष्ट न हो ।' राजा ने खरीता अपने हाथ से एलिस के हाथ में दिया । राजा का गला रुद्ध हो गया और आखो मे आसू भर आये । पर्दे के पीछे रानी की सिसक सुनाई पडी मानो उस खरीते पर इस सिसक की मुहर लगी हो ।
१२२ झांसी की रानी गले को किसी तरह काबू में करके राजा ने एलिस से कहा, 'आपको मैं अपना मित्र मानता हू । बडे साहब मालकम भी मेरे मित्र हैं । गार्डन तो वैसे मेरा छोटा भाई हो ...' राजा के हृदय में पीडा हुई । वे रुक गये । एलिस ध्यानपूर्वक उनकी बात सुनने लगा । राजा बोले, 'इस समय गार्डन मेरे पास होता तो मुझको बडी खुशी होती' और मुस्कराए । पीड़ा कम्पित होठो पर वह अर्द्धस्मित किसी असह कष्ट को जोर के साथ दबा गया । 'गार्डन का हुक्का दीवान खास में रक्खा हुआ है पियो तो मँगवा दूँ।' 'नही सरकार ।' 'देखो मेजर साहब दामोदरराव कितना सुन्दर है। यह बडा होनहार है। मेरी रानी सी माता को पाकर झासी को चमका देगा । मेरी झासी को ये दोनो बडा भारी नाम देंगे ..' पर्दे के पीछे फिर सिसकी सुनाई दी । एलिस ने आख के एक कोने से उस ओर देखकर मुह फेर लिया । राजा ने पर्दे की ओर मुह फेरकर रुद्ध स्वर में, मुश्किल से, कहा, 'यह क्या है ? रोती हो ? मै अच्छा हो रहा हूँ। पर मुझे अपनी बात तो कह लेने दो।' रानी ने धीरे से खांसकर अपना कठ संयत किया । राजा स्थिर होकर बोले, 'मेजर साहब हमारी रानी स्त्री जरूर है, परन्तु इसमें ऐसे गुण हैं कि संसार के बडे बडे मर्द इसके पैरो की धूल अपने माथे पर चढावेगे । बहुत प्रयत्न करने पर भी राजा अपने आसुओ को न रोक सके । एलिस ने कहा, 'महाराज थोड़ी बात करे नही तो तबियत देर में अच्छी हो पावेगी ।' रानी ने जरा जोर से खासा मानो राजा को निवारण कर रही हो ।
लक्ष्मी बाई १२३ दुर्बल हाथो़ से राजा ने आंसू पोछे। गले को नियन्त्रित किया। 'बोले रानी बहुत अच्छी व्यवस्था करेगी। आप लोग दामोदरराव की नावालिगी के कारण परेशान मत होना।' राजा के हृदय में पीडा बढी। किसी प्रकार उसको काबू में करके उन्होने कहा, 'मुझे झासी के लोग बहुत प्यारे हैं। मैं चाहता हू मेरी जनता सुखी रहे। मैने जिसको जो कुछ दिया है, वह सब उसके पास बना रहना चाहिये। मुगलखा बहुत बडा गवैंया है मेजर साहब।' एलिस ने सोचा गङ्गाधरराव का दिमाग फिरने को है। जरा चिन्तित हुआ। राजा बोले, 'उसको मैने इनाम में हाथी दिया है। वह उसी के पास रहेगा। और हाथी के व्यय के लिये मैंने जो कुछ लगा दिया है वह भी उसके पास रहना चाहिये।' इसके उपराप राजा को खासी आई और साथ ही रक्त। प्रतापसाह वैद्य बाहर मौजूद था। बुला लिया गया। दवा दी गई। राजा को कुछ चैन मिला। पर वह जान गये कि यह क्षणिक है। बोले, 'एलिस साहब, ये हमारे वैद्य जी बडे हठी हैं। अपना एक अलग नगर बसा रहे हैं। मैने अनुमति दे दी है। इनके हठ को कोई तोडे नही।' वैद्य की आंख में भी एक आंसू आ गया। उसको वैद्य ने किसी बहाने से जल्दी पोछ डाला। वैद्य बाहर चला गया। राजा के होठो पर एक क्षीण मुस्कराहट फिर आई। 'मैं चाहता हूँ कि मेरी नाटकशाला मे चाहे खेल हो या न हो, परन्तु पात्रो के लिये जो वेतन खजाने से दिया जाता है वह उनको मिलता रहे।' राजा फिर खासे। अबकी बार ज्यादा खून आया। वैद्य फिर भीतर आया। उसने आज्ञा के स्वर में प्रतिवाद किया, 'महाराज अब बिलकुल न बोले...'
१२४ झांसी की रानी राजा ने तुरन्त कहा, 'थोडा सा और फिर बस । तुम्हारी और तुम्हारी दवा की कोई जरूरत न रहेगी ।' राजा की आकृति बिगडी । सब लोग चिन्तत और भयभीत हुये । बहुत कष्ट के साथ बोले, 'मेजर साहब एक अन्तिम प्रार्थना—बस एक — झाँसी अनाथ न होने पावे ० ।' कराहने लगे । आँखे फिरने लगी । कप्तान मार्टिन एक ओर चुप बैठा हुआ था । उसने एलिस को चल देने का संकेत किया । एलिस उठना ही चाहता था कि राजा बोले, चित्रकार सुखलाल, हृदयेश कवि.....' एलिस उठा उसने प्रणाम करके राजा से कहा, 'सरकार हम लोग जाते हैं । समाचार मिलते ही तुरन्त हाजिर होगे ।' राजा ने आँखे स्थिर की । कहा, 'मेजर साहब भूलना मत । हमको आपका भरोसा है । हमारी प्रार्थना को ध्यान में रखना । लाट साहब को मेरी बिनती.. ' इसके बाद वे नही बोल सके और बेसुध हो गये । एलिस और मार्टिन चले गये । लक्ष्मीबाई तुरन्त पर्दे से बाहर निकल आई । पति की उस दशा को देखकर चीत्कार कर उठी । मोरोपन्त ने दामोदरराव को बुलवा लिया । नाना भोपटकर लेकर आये । रानी को कुछ सान्त्वना मिली ।
लक्ष्मीबाई १२५ [ २६ ] जिस इमारत में आजकल डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का दफ्तर है, वह उस समय डाक बङ्गले के काम आता था। पास ही झासी प्रवासी अङ्गरेजो का क्लब घर था। एलिस और मार्टिन राजा के पास से आकर सीधे क्लब गये। वहा और कई अङ्गरेज आमोद-प्रमोद मे मग्न थे। यहा इन दोनो का जी हल्का हुआ। 'उन अङ्गरेजो ने महल का हाल पूछा।' 'राजा बीमार है। बच नही सकता।' 'इलाज वही दकियानूसी होगा ?' 'एक मूर्ख वैद्य कुछ पीस-पासकर मधु के साथ खिला रहा है।' 'कैप्टन एलन' का इलाज करवाओ।' 'खुशी से, परन्तु ये लोग ऐसे कट्टर-धर्मी हैं कि शायद राजा एलन के हाथ की छुई हुई दवा न खायगा।' 'शायद अच्छा हो जाय। न हुआ तो क्या होगा ?' 'राजा ने एक लडके को गोद लिया है।' 'कब ?' 'आज हम लोगो के सामने।' 'गोद ! यानी झासी में वही मनमानी और कानून हीन व्यवस्था जारी रहने दी जावेगी ?' एलिस ने इस प्रसङ्ग को आगे नही बढने दिया। तब व र्तालाप की धारा दूसरी ओर मुड गई और बातचीत में सभी शरीक हो गये। 'सुनते हैं रानी बहुत सुन्दर है। अच्छी घुडसवार है। यदि नाचना सीखे तो उसका नृत्य अजीब होगा।' एक अङ्गरेज ने कहा। 'चुप मूर्ख', एलिस बोला, 'अभी उसी के राज्य में बैठे हो। हिन्दुस्थानी लोग अपने राजा-रानी के बारे ऐसी बात सुनना बिलकुल पसन्द नही करते।'
१२६ झांसी की रानी 'हिश ! (डैमइट) वह तो गधो का झुण्ड है। फिर भी मैं तुम्हारी बात मानता हू। इसलिये नही कि रानी-वानी से डरता हूं, किन्तु इसलिये कि प्याले के ऊपर मीठा-मीठा पवन बहना चाहिये न कि बहस-मुवाहिसे की गरम आधी। वरना मै अपनी पूरे महीने की तनखाह की होड़ लगाता। तो भी मेजर, मैं सुनता हू राजा नाचता अच्छा था। किसी ज़माने में, और उसकी नाटकशाला में बडी सुन्दर शकले थी। बहुत बढिया नाच।' 'हम सब जानते हैं, पर देखा नही है। वैसे और हिन्दुस्थानी नर्तकियो का नाच बहुत देखा। मगर मजा नही आता। इस देश के नाच तक में कोई ढङ्ग नही, कोई मोहकता नही।' 'पर नर्तकिया हैं हसीन। मैं शर्त लगाता हूँ, नाच-गान चाहे उनका उतना खूबसूरत न हो।' 'ये लोग हमारे नाचने-गाने को भद्दा समझते है। मैंने हिन्दुस्तानियो का अपने नृत्यग्रह में आना बन्द कर दिया है। केवल नवाब अलीबहादुर आता है। वह समझदार है।' 'सिर तो जरूर हिलाता है।' 'ओह ! बहुत काम का आदमी है। तुम जानने हो।' 'वह अपने दो-एक दोस्तो को साथ लाना चाहता है।' 'वेकार है। मैं पसन्द नही करता।' 'यहा से ले क्या जावेगा ?' 'हम लोगो की स्त्रियो के वारे में बुरा ख्याल फैलावैगा !' 'कोई परवाह नही। बुरा ख्याल फौज और पुलिस में नही फैलना चाहिये।' 'एक से एक बढकर वे दिमाग हैं। उन कारतूमो को मुँह से खोलने से इन्कार किया तो हमने रगड दिया। रह गये। जितना वेतन हम इन लोगो को देते हैं, उतना इनको दुनिया में कही भी नहीं मिल सकता।'
'और तुम्हारे रिसाले में जो कुछ ब्राह्मण माथा रंग रंग कर परेड में आते थे उनका तो अनुशासन कर दिया ?' 'हा। पहले उन्होंने कहा हमारा टीका है । धर्म की बात । फिरें हमने पुछवा दिया । डैम्मइट ऑल । भई कितनी जहालत भरा मुल्क है !' 'जरूर । परेड से छुट्टी पाकर बारक में न सिर्फ माथे पर बल्कि माथे से लेकर पैर की उँगली तक टीको से देह को रगलो हमको फिकर नही । इस धर्म से हमको महान कष्ट होता है ।' 'अभी यह कौम बिलकुल नादान और जाहिल है। अङ्गरेजी पढने से अकल कुछ सुधरेगी । बाईबिल का पढाना मदरसो में इसीलिये जरूरी रक्खा गया है । जब अङ्गरेजी का प्रचार हो जावेगा और बाईबिल की संस्कृति इनके खून में बैठ जायगी तब धरातल कुछ ऊँचा होगा ।' 'हाँ, और कदाचित् तब इस देश के लोग हमारे शेक्सपियर, वाल्टर स्काट, बायरंन की पूजा कर उठे । यहा के लोग पूजा, नमाज बहुत जल्दी कर उठते हैं।' 'गंगाधरराव की नाटकशाला में जो नाटक खेले जाते थे वे कौनसी बला होते हैं ?' 'महज कूडा कर्कट तो नही है । शकुन्तला नाटक तो मैने भी पढा है । मोनियर विलियम्स का अनुवाद । खूबसूरत चीज है। यद्यपि टैम्पैस्ट की मिराण्डा को शकुन्तला नही पहुचती, फिर भी एक चीज है··' 'ऐसी कितनी पुस्तके हिन्दू मुसलमानो के पास होगी ?' 'हिन्दुओ की गाठ में शकुन्तला, कुछ वेद और कुछ ऐसा ही साहित्य है । मुसलमानो के पास कुरान, गुलिस्ताँ, वोस्ताँ और उमरखंयाम की रुबाइया । बस खतम । बाकी सब कूडा, महज रद्दी ।' 'तुम तो लार्ड मैकाले की भाषा में बोल रहे हो पट्टू ।' 'मैकाले क्या गलत कहता है ? उसने तो हिन्दू मुसलमानो को बहुत बडा गौरव दिया जो यह कह दिया कि इनकी सारी अच्छी पुस्तकें एक छोटी सी अलमारी मे बन्द की जा सकती हैं।'
१२८ झांसी की रानी 'मैं कसम खाता हूं मैकाले ने 'छोटी सी' अलमारी नही कहा है। मै कहता हूँ, कि इनकी अच्छी पुस्तके अलमारी के एक ही कोने में आ सकती हैं।' 'जाने दो, इनकी नर्तकिया अवश्य कभी कभी परियो सी जान पड़ती हैं।' 'जब वे ढेरो जेबर लादकर सामने आती हैं तब जान पडता है मानो फूलो में जुगनू जड दी हो।' 'कभी कभी नाच के कुछ कदम भले लगते हैं।' 'लेकिन गाना बिलकुल चीख चिल्लाहट। हा सारगी का बाजा मीठा लगता है और जब तबला धीमी लय मे बजता है तब नाच उठने को जी चाहने लगता है।' 'हिन्दुस्थान का जलवायु,,प्रकृति, अनाज, दूध सब अच्छा, लेकिन देश कुसंस्कारो से भरा हुआ है । किसान बहुत मिहनती नही हैं ।' 'और चोर डाकुओ के मारे चन नही ले पाते हैं।' 'हम लोग हिन्दुस्थान में उन्ही का नाश करने के लिये तो मौजूद हैं।' 'रियासतो में बडा अन्धेर, बडा अत्याचार होता है।' 'सुनता हूँ किसी रियासत में एक इत्रफरोश गया। एक सरदार ने छत्तीस हजार रुपये का इत्र खरीद डाला। जब इत्रफरोश ने कहा कि अभी मेरे पास बेचे हुये इत्र से भी बढ़िया और मौजूद है, तब उस सरदार ने वह सब खरीदा हुआ इत्र अपनी घुडसाल के घोड़ो की पूंछो पर उडेल दिया और कहा यह इत्र तो हमारे लायक नही। घोडो की पूंछ की बू जरूर इसमे दूर हो जावेगी, और तुम्हारा जो इससे बढ़िया इत्र है, वह यदि बेचो तो गधेरो के गधो की पूंछ पर छिड़कवा दूंगा। जब राजा के पास यह समाचार पहुचा तब उसने सरदार को शाबाशी दी और खजाने से छत्तीस के दुगुने बहत्तर हजार रुपया सरदार के पास भेज दिये ।' 'यह झांसी के राजा का ही किस्सा है।'
लक्ष्मीबाई १२६ 'मैंने सुना है कि इस कहानी का सम्बन्ध दिल्ली के बुड्ढे बादशाह बहादुरशाह से है।' 'वह तो कविता करने में मस्त रहता है।' 'उसको बादशाह कौन कहता है?' 'शिष्टचार। केवल शिष्टाचार।' 'ऐसा कैसा शिष्टाचार ! बादशाह सिर्फ एक है। एक के सिवाय दूसरा किसी प्रकार नही हो सकता है। वह है इंगलैंड का बादशाह। थी चियर्स। हुर्रै !' 'हुर्रै ! इन सब कठपुतलियो को खाक करो। कहा के राजा और कहा के बादशाह ! कम्बख्त किलो और महलो में बैठे बैठे गुलछर्रे उड़ाते हैं। गरीबो की औरतो को सताते हैं और डाके डलवाते हैं। डैम डैम ऑल।' 'चुप चुप अभी नही। जरा ठहर कर सब होगा। सब मुकुट और ताज हमारे पैरो पर गिरेंगे। पर होगा सब धीरे धीरे। कुछ दिनो में सारा हिन्दुस्थान ईसाई हो जावेगा। और इङ्गलैंड का राज्य अमर।' 'धीरे धीरे बेवकूफ अभी कसर है। इस समय चोर-डाकुओ और फसादियो को ठंडा करके व्यौपार और खेती को बढाना है। जनता हमको श्रद्धा की दृष्टि से देखेगी। जो हिन्दुस्थानी अंगरेजी पढ लिख जाय उसको छोटी मोटी नौकरिया देकर अगरेजो का अदब करना सिखलाया जावेगा। वे उस अदब को जनता में फैला देंगे। जनता हमेशा कृतज्ञ रहेगी और हमारे हाथ जोड़ते नही अघावेगी। हमारे छोकरे सदा सर्वदा हमारा आतंक बनाये रक्खेगे। वही आतंक हमारा सब कुछ होगा।' 'ओह डियर मी ! तुम तो बिलकुल अरस्तू और सुकरात हो गये !' 'हिश ! हमारे मन को केवल एक बात दिक करती है—ये राजा और नवाब !' 'फिर वही हिमाकत। कह दिया कि धीरज धरो। इंगलैंड के राजनीतिज्ञ काफी होशियार और कुशल हैं और हिन्दुस्थान में गवर्नर
१३० | झाँसी की रानी
जनरल को अपनी काउन्सिल की सम्मति को रद्द करने का पूरा अधिकार है। यहां की जनता को मुट्ठी में रखने के लिये कुछ राजा नवाबों का बनाए रखना बहुत जरूरी है। और यह भी बहुत जरूरी है कि ऐसे बड़े बड़े राजों और नवाबों की रियासतों में अत्याचार होते रहे, जिसमें अंग्रेजी इलाके की प्रजा अपनी बेहतर हालत को, रियासती प्रजा की अवतर हालत से सदा मुकाबला करती रहे, तोलती रहे। और पुकार कर कहती रहे कि हिन्दुस्थानी हुकूमत से अंग्रेजी हुकूमत बहुत अच्छी। समझे !' 'जनता में ऊँची-नीची श्रेणियां कायम रखने की जरूरत है।' 'तुम्हारा सिर। उनमें जात-पात, ऊँच-नीच बहुत सख्या में जमानों से है। केवल जिमीदारी, ताल्लुकेदारी प्रथा को मजबूती के साथ दाखिल करना रह गया है। बंगाल में हो गया है। सब जगह कर दिया जावेगा। सिर उठाने वाली जनता को ये जिमीदार, ताल्लुकेदार ही कुचल दिया करेंगे। हमको हाथ जमाने की परवाह ही न करनी पड़ेगी। सब बन्दोबस्त आराम से होता चला जावेगा।' 'मुझको यह शब्द 'बन्दोबस्त', बहुत प्यारा लगता है। हर जगह, कोने कोने में, बन्दोबस्त होना चाहिए। 'तुमने अभी अभी कहा 'तुम्हारा सिर' वापिस लो इसको। तुम क्या मुझसे होड़ लगा सकते हो कि हिन्दुओं की जात-पात और मुसलमानों का ऊँच नीच हमारे सहायक नहीं हैं ?' 'बेशक होड़ लगा सकता हूँ। यह सब होते हुए भी इन लोगों में बड़े बड़े राजा और बादशाह हुये हैं। फिर भी हो सकते हैं। इसलिये इस देश को अनन्त काल तक अपने हाथ में बनाये रखने के लिये— हिन्दुस्तानियों के लाभ और अपने रोजगार के हेतु—वही दूसरी तरकीब बेहतर है। हम-तुमसे कहीं ज्यादा चतुर राजनीतिज्ञों ने इस सम्पूर्ण समस्या पर यों ही माथापच्ची नहीं की है।'
लक्ष्मीबाई १३१ प्यालो का दौर और अखण्ड साम्राज्य की कल्पना, अनेक अवसरो की तरह, क्लब में लगभग उफान पर आ रही थी कि क्लब के बाहर तेज़ी से दौडकर आने वाले घुड सवारो की आहट सुनाई पडी । पहरे वाले ने सलाम किया और कहा, 'हुजूर, राजा के यहां से खबर आई है कि वे बेहोश पडे हैं।' सबने अपने अपने प्याले रख दिये । सतर्क हो गये । एक दूसरे की ओर देखने लगे । एलिस ने कहा, 'सूचना दो कि मै थोडी देर में आता हूँ।' पहरे वाला चला गया । मार्टिन ने एलिस से पूछा, 'राजा मरने वाला है या शायद मर भी गया हो । हिन्दुस्थानी लोग असल बात को देर तक छिपाये रखने के अभ्यासी होते हैं। यदि राजा मर भी गया हो तो क्या वह गोद स्वीकार करली जावेगी ? मेरे ख्याल में लार्ड डलहौजी झासी को अङ्गरेज़ी इलाके में मिला लेगे ।' 'हिश !' एलिस ने उँगली से वर्जित कर के कहा, 'कुछ ज्यादा पी गये हो मालूम होता है।' उसी क्षण और घुडसंवार आये। पहरे वाला भीतर आया । बोला, 'हुजूर' अब महल से दूसरा समाचार यह आया है कि महाराज अच्छे हैं और हुजूर को तुरन्त बुलाया है।' 'डैम इट ।' धीरे से मार्टिन के मुंह से निकल पडा । पहरेदार ने सुन लिया । सिर नवाकर बाहर चला गया । उसके कलेजे में कुछ कसक गया। एलिस ने आंखे तरेरी । मार्टिन ने अगूठा दिखाकर उपेक्षा की । कहा, 'हमारा नौकर है। राजा का नौकर नही ।' एलिस डाक्टर एलन को साथ लेकर राजमहल चला गया । गङ्गाधरराव को रनवास के कक्ष मे पहुँचा दिया गया था । जब एलिस और एलन पहुंचे राजा होश में थे । एलिस को देखकर 'वे प्रसन्न हुये । बोलने की चेष्टा की । टूटे टूटे बोले ।
१३२ झाँसी की रानी उसी दिन जो खरीता राजा ने एलिस के हाथ में दिया था उसका स्मरण दिलाया और उसको सूचित किया कि पोलिटिकल एजेंट मेजर मालकम के पास भी एक खरीता भेज दिया है—केवल एक बात उसमें विशेष है कि सन् १८१७ में रामचन्द्रराव के साथ जो सन्धि कम्पनी सरकार की हुई थी उसमे झाँसी राज्य दवाम के लिये चिरकाल के लिये, शिवराम भाऊ के वंशजो के अधिकार में रहने की बात लिख दी गई थी । उस लिखे हुये वचन का पालन किया जाना चाहिये । एलिस राजा की हालत देखकर उनको बातचीत करने से रोकता रहा । वे बोलने का प्रयत्न करते-करते फिर अचेत हो गये । उन्हे बातचीत करते-करते बीच में बेहोशी आ आ जाती थी । एलिस ने डाक्टर एलन की औषधि खाने के लिये अनुरोध किया । वह उनके पास गया । परन्तु क्लब में शराब पी थी । मुँह से गन्ध आरही थी । राजा को बहुत अवहेलना हुई । उसने सोचा अहिन्दू की छुई हुई दवा न खायेगे । प्रस्ताव किया, ‘सरकार इसमें गङ्गाजल मिला दिया जावेगा । दवा पवित्र हो जायगी, आप पिये शीघ्र आराम मिलेगा ।’ राजा की आकृति से ऐसा जान पडा मानों उन्होने स्वीकार कर लिया हो । वे शायद शराब की बू से छुटकारा पाना चाहते थे । कैसा भी कुसस्कृत हिन्दू हो मरने के समय कैसे भी सुसंस्कृत हिन्दू या अहिन्दू को शराब की बू फैलाते हुये पसन्द न करेगा । एलिस ने तुरन्त एक ब्राह्मण के हाथ दवा भेजी । राजा ने छूने तक से इनकार कर दिया । एक दिन और पीडा में कटने को था । उस दिन (२० नवम्बर को) दुपहरी में कुछ नीद आई । ४ बजे आँख खुली । महल के सामने झासी की जनता कुशल-समाचार के लिये व्याकुल खडी थी । राजा गङ्गाधरराव को पल पल पर बेहोशी आ रही थी । ज्यो त्यो करके वह दिन कटा ।
लक्ष्मीबाई १३३ दूसरे दिन उनकी अवस्था असाध्य हो गई। अन्त में मुँह से केवल यह निकला, गंगाजल।' उनको तुरन्त गङ्गाजल दिया गया। एक क्षण के लिये उनको ऐसा जान पड़ा मानो रोगमुक्त हो गये हो। तत्क्षण सचेत होकर बोले, 'मैने बहुत अपराध किये हैं • बहुतो को सताया है...सब क्षमा करे...ओमहरि...।' कुछ क्षण उपरान्त राजा का देहान्त हो गया। महल में हाहाकार मच गया। जिस रानी को कभी किसी ने विह्वल नही देखा था, वह करुणा के बाध तोडे जा रही थी। मोरोपन्त और नाना भोपटकर ने क्रन्दन करते हुये दामोदरराव को रानी की झोली में रख दिया। लक्ष्मी दरवाजे बाहर, लक्ष्मी ताल के किनारे गङ्गाधरराव के शव का दाह धूमधाम के साथ किया गया। स्मशान भूमि पर एलिस और मार्टिन भी उपस्थित थे। दूर रेग्यूलर केवलरी के सिपाही भी। सब काले बिल्ले बाधे हुये। एलिस और मार्टिन कुतूहल के साथ अन्तिम क्रिया-कर्म देख रहे थे और हिन्दुस्थानी सिपाही, रुदन करती हुई झासी की जनता के साथ, रुद्ध-कण्ठ थे। एलिस ने २० नवम्बर सन् १८५३ को राजा गङ्गाधरराव का एक दिन पहले का दिया हुआ खरीता पोलिटिकल एजेंट कैथा*, के पास भेज दिया था। २१ नवम्बर को राजा गङ्गाधरराव का देहान्त हुआ। यह समाचार भी उसने अविलम्ब पहुँचा दिया। *उस समय बुन्देलखण्ड और रीवा का पोलिटिकल एजेंट कैथा जिला हमीरपुर में रहता था।
१३४ झांसी की रानी [ २७ ] एलिस का भेजा हुआ राजा गङ्गाधरराव का १६ नवम्बर का खरीता और उनके देहान्त का समाचार मालकम के पास जैसे ही कैथा पहुंचा उसने गवर्नर जनरल को अपनी चिट्ठी अविलम्ब (२५ नवम्बर के दिन) भेज दी । चिट्ठी के साथ एलिस का भेजा हुआ खरीता और गङ्गाधरराव का वह खरीता भी, जो उन्होने सीधा मालकम के पास पहुंचवाया था, भेज दिया । मालकम की चिट्ठी का सार यह था — 'झांसी के राजा को बिना कम्पनी सरकार की अनुमति लिये, गोद लेने का अधिकार नही है । रानी योग्य और लोकप्रिय हैं, परन्तु कम्पनी का शासन जन-हित की दृष्टि से ज्यादा अच्छा होगा । ऐसी परिस्थिति में रानी को पाच सहस्र मासिक वृत्ति, निजी सम्पत्ति और नगर का महल दे दिया जावे ।' इस प्रकार की चिट्ठी के भेजने के उपरान्त ही मालकम ने झांसी के बन्दोवस्त का प्रयास शुरू कर दिया और अपना फौज फाटा बढा दिया । इधर झांसी दरबार के लोगो का विश्वास था कि दत्तक पुत्र के नाम पर राज्य चलेगा और वे दामोदरराव के नाम पर शासन प्रबन्ध करने भी लगे । उन्नीसवी शताब्दि के आरम्भ काल में जब कम्पनी का राज्य जल्दी जल्दी बढा तब वह अपनी नीति और हथियार की विजय के बोझ से लदी सी जा रही थी और समय समय पर कम्पनी के साझीदारों ने विचार प्रकट किया था कि विजय और इलाके की सीमा बढाने की योजनायें घृणास्पद हैं । और ब्रिटिश जाति की इच्छा, प्रतिष्ठा और नीति के प्रतिकूल हैं । असल बात यह थी कि कही ऐसा न हो कि मुफ्त में आया हुआ इतना माल किसी अदृष्ट गड्ढे मे चला जावे । इन योजनाओ का सही रूप डलहौजी था उसकी नीति में कुछ भी लगा-लिपटा हुआ न था । उसका वक्तव्य स्पष्ट था ।