झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३६१ पीरअली—'जार पहाडी पर से ।' रोज़—'ओ सिली ! (मूर्ख) जार पहाडी से किले का बहुत कम नुकसान होगा ।' पीरअली—'जी नही । किले की पश्चिमी दीवाल जो मटीली टोरया पर है बहुत कम ऊँची है । उसको दाहिनी बगल में शकरगढ किले का उत्तर पश्चिम हिस्सा है । इसी में पानी पीने का कुआ और रानी साहब के पूजन का मन्दिर है । तमाम औरतें जो सिपाहगीरी का काम करती हैं, इसी जगह दुपहरी या शाम को जमा होती हैं। इस जगह के तोड़ने से किला हाथ में आ जावेगा और शहर की एक इमारत न बचेगी ।' रोज़—'और उत्तर की ओर से ?' पीरअली—'उनाव फाटक और भाडेरी फाटक की सीध में मटीले टेकड़े हैं, जिनकी वजह से आपका तोपखाना कामयाब न हो सकेगा । रोज़—'अच्छा, तुम हमको दक्षिरा तरफ का कोई फाटक वाल मिला दो ।' पीरअली— मैने अर्ज़ की न—कोशिश करूंगा ।' रोज़ ने पीरअली को धन्यवाद देकर वापिस किया । पीरअली जब सागर खिडकी पर वापिस आया, उसने वरहामुद्दीन को सावधान पाया । पीरअली ने कहा,'खुदा खुदा करके लौट पाया हू । आज बहुत थोडा भेद मिल पाया है । कल मौका मिलते ही फिर जाऊँगा ।' बरहामुद्दीन ने पूछा, 'आज कुछ मालूम हो पाया या इतनी मिहनत सब बेकार गई ?' 'बेकार तो नही गई, ' पीरअली ने उत्तर दिया, 'यह मालूम कर लाया हूँ कि एक भी तोप या तोपखाना हिन्दुस्थानी सिपाही के हाथ में नही है । सब तोपे अङ्गरेजो ने अपने काबू मे रख छोडी हैं ।' 'इतना तो मुझको भी मालूम है कि अङ्गरेजो ने हिन्दुस्तानियो का भरोसा करना बिलकुल छोड़ दिया है ।'