भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 374

लक्ष्मीबाई ३६३ [ ६६ ] उसी रात रोज़ ने सनर्कता के साथ जार पहाड़ी पर तोपखानो के मोर्चे बाधे । सुवह होते ही तोपो के मुहरे ठीक किये, निशान साधे । तोपो पर पलीते पडे और शहर का विध्वन्स आरम्भ हो गया । लोग बेहिसाब मरने और घायल होने लगे । आगे, लगी बाजार बन्द रहे । साधारण जनता भूखो प्यासो मरने लगी । शहर में हाहाकार मच गया झासी की गलिया वीरान दिखने लगी । किले की पश्चिम-दीवार में सूराख़ हो उठे । शहर का हाल जानकर रानी दुखी हुई । तुरन्त सवार होकर किले से उतरी और बरसते हुये गोलो में होकर प्रत्येक मुहल्ले को उत्साह दान किया । आग बुझाने का बहुत अच्छा प्रवन्ध किया । अन्नक्षेत्र और सदावर्त कायम किये । तब किले को लौटी । लौटते ही गुलाम गौस के पास पहुँची । उसने भक्ति पूर्वक प्रणाम किया । 'खा साहव, आज पश्चिम की ओर कोई नया मोर्चा बना है । इसका निरोध होना ही चाहिये,' रानी ने कहा, 'चौथाई नगर बरबाद हो गया है । कल न जाने क्या गत होगी ।' 'दक्षिणी मोर्चे का सरकार इन्तजाम करदें,' गौस ने निवेदन किया, में अङ्गरेजो के उस मोर्चे को देख लूँगा ।' रानी ने कहा में मोतीबाई को भेजती हूँ ।' गौस बोला, वह कमाल की गोलन्दाज है सरकार, मगर इस मोर्चे को न सँभाल पावेगी । अङ्गरेज लोग दक्षिण के सिवाय और किसी ओर से नही आ सकते ।' रानी ने पूछा, 'तुम्हारा ऐसा विचार क्यो है ?' 'हुजूर' गौस ने उत्तर दिया, इसी दिशा से किला अत्यन्त निकट पडता है ।' रानी ने कहा, 'बख्शिन को यहा भेज दूँ ?'