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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३६४ झाँसी की रानी 'भेज दीजिये सरकार,' गौस ने सहर्ष स्वीकार किया, 'वह बड़े खानदान की है ।' रानी की त्योरी बदली, परन्तु उन्होने तुरन्त नियन्त्रण किया । सोचा, 'आत्म त्याग में वह वेश्या-पुत्री किस खानदान वाले से कम है ? हे भगवान्, त्याग में भी ऊँचनीच !' और चली गई । बख्शिन ने दक्षिण बुर्ज की 'घनगरज' और उसकी 'छोटी बहिन' को संभाला । वह गौस के बतलाये हुये क्रम पर काम करती रही । गुलाम गौस तुरन्त पश्चिमी बुर्ज पर पहुँचा । यहा लालता काम कर रहा था । गौस ने बारीकी के साथ दूरबीन द्वारा निरीक्षण किया । बोला, 'पण्डित जी अङ्गरेजो का मोर्चा पहिचाना ?' 'वह देखो न काली टोरो के पीछे है ।' 'नही पडित जी, काली टौरों के पीछे महज बारूद का धुआं किया जा रहा है जिसमे हम लोग धोखा खाते रहे । वे जो ताजा लाल मिट्टी के ढेर लगे हैं तोपे वहा हैं ।' लालता ने दूरवीन पकडी 'देखो' असहमत हुआ । 'खा साहव' लालता ने कहा, 'मिट्टी और बजरी के उन ढेरो में तोपें नही बिठलाई जा सकती ।' 'माफ कीजियेगा पडित जी,' गौस बोला, तोपे खास मतलब से उन्ही ढेरो में बिठलाई गई हैं । जरा ठहरिये ।' गौस ने तोपो पर दूरबीने कसी । तोपो को इधर-उधर खिसका कर ठीक किया । निशान बाधे, बारूद और गोले भरे । इस कार्य में उसको अधिक समय नही लगा । इसके बाद इधर गौस ने तोपो को पलीते दिये उधर वे मिट्टी के ढेर उघड़ गये मरे हुये तोपची नजर आये । उलटी हुई और टूटी तोपें । फिर बाढें की गई । अङ्गरेजो के पश्चिमी मोर्चे का जवाब बिलकुल बन्द होगया । नगर में चैन हो गया । गौस ने जाकर रानी को प्रणाम किया । रानी सोने के

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