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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

३६६ झाँसी की रानी गौस के 'घनगरज' तोपखाने के शोर और मृत्युवमन का नाम इन लोगो ने व्हिसलिंग् डिक—हल्ला करने वाला शैतान रखा था। आज्ञा पाते ही दक्षिणी ब्रिगेड ने अत्यन्त तीव्रता के साथ काम शुरू किया। उनके तोपखाने लगातार भयंकर आग और गोले उगलने लगे। बख्शिन जवाब पर जवाब दे रही थी बारूद और धुएँ से उसका सुन्दर चेहरा काला पड गया था। पसीने की रेखाओ से जितना चेहरा घुल गया था केवल उतना उसके स्वर्ण वर्ण को प्रकट कर रहा था। ब्रिगेड ने तोपो की रक्षा में किले की ओर दौड लगाई। घनगरज के तीपखाने ने उनका सहार कर दिया। बहुत अंग्रेजी फौज मारी गई। उसको लौटना पडा। परन्तु उनके तोपखाने ने एक काम कर लिया। एक गोला बुर्ज के कंगूरे को तोडकर बख्शिन के कन्धे पर लगा। कन्धा टूट गया, उड़ गया। वह अचेत होकर गिर पड़ी। बख्शी को पूर्वी बुर्ज पर समाचार मिला। निर्मम होकर बख्शी ने उत्तर दिया, 'उससे बढकर झासी और झासी की रानी हैं। शाम को देखूगा। तब तक दाह मत करना।' बख्शी अपने काम पर जुट गया। एक वार आकाश की ओर उसने देखा। गीता के कृष्ण को याद किया और अपने को कठोर से कठोर सकट में डालता हुआ तोपो को दुगुनी तेजी के साथ चलाने लगा। रोज का पूर्वी मोर्चा बुझ गया। परन्तु बख्शी का पलीता सुलगता और आग देता रहा। बख्शिन चली गई। रानी तुरन्त आईं। बख्शिन के रक्तमय शव को गोद में रख लिया। गला रुद्ध हो गया, एक शब्द भी मुह से नही निकल रहा था—और न आँख से एक आंसू। तोपखाना बन्द हो गया था। अङ्गरेजो के गोले घड़ावड़ बुर्जो और दीवारो से टकरा रहे थे और उनको ढा रहे थे। मुन्दर ने दूरवीन से अपनी बुर्ज पर से देखा। दौड़कर आई। घबराकर बोली, 'बाईसाहव !'

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