झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३६७ रानी के मुँह से केवल एक शब्द निकला, 'गौस ।' - सुन्दर समझ गई। दौड़कर पश्चिमी बुर्ज से गुलाम गौस को बुला लाई । गौस ने देखा झाँसी की रानी धूल मे बैठी बख्शिन के शव से लिपटी हुई हैं। गौस ने कहा, यह क्या सरकार, अभी न जाने कितने सरदार कुरबान होगे ? हुजूर हम लोगो को समझाती हैं कि स्वराज्य की लडाई किसी के मरने-जीने पर निर्भर नही है। और फिर बख्शिनजू तो अमर हो गई । उठिये । देखिये उस जवामर्द बख्शी को । वह अपने ठिये पर अटल है। आप ऐसा मोह करेगी तो हम लोग गोरो से कितने दिन लड सकेगे ? आप यहाँ से हट जाय और दीवान खास में बैठकर हुकुम भेजती रहे । मैं इनको मजा चखाता हूँ ।' रानी बख्शिन के शव का आवश्यक प्रबन्ध करके दीवान खास में चली गई । गौसखा ने 'बिसमिल्लाह' किया और घनगरज को सँभाला । तीन बाढो में ही अङ्गरेजी मोर्चे का तोपखाना, तोपची और तोपखाने पर काम करने वाले, सब स्वाहा हो गये । गौस ने अपने साथियो से कहा, 'यह तो मेरे साथी सरदार को मारने का बदला हुआ, अब कुछ प्रसाद भी देता हूँ। देखो भोखनबाग के पूर्व में गुसाइयो के मन्दिरो की आड से ये लोग सैयर-फाटक पर गोलाबारी कर रहे हैं। बिचारा खुदाबख्श मन्दिरो के लिहाज के कारण जवाब नही दे पाता, परन्तु मन्दिरो के बीच में सन्ध है। उसी सन्ध में होकर अङ्गरेजी तोपखाना काम कर रहा है। वह सन्ध खुदाबख्श की सीध में नही है, पर घनगरज की सीध में हैं।' साथी ने अनुरोध किया, 'मन्दिर पर गोला न पडे खासाहब । नही तो बड़ा अनर्थ हो जावेगा ।'