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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 526 में से

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झांसी की रानी 'अगर मन्दिर की एक ईंट भी मेरे गोले से टूट जाय तो तलवार से मेरी गर्दन कलम कर देना।' गौस ने घनगरज का मुहरा मोड़ा, परन्तु वहा से सीध नही बैठती थी और न निशाना जमता था। तोप को ज्यो का त्यो करके वह रघुनाथसिंह वाली बुर्ज पर गया। 'दीवान साहब,' गौस ने विनय की, 'दो पल के लिये तोप मुझे बख्श दीजिये। सैयर-फाटक के सामने वाला अङ्गरेजी तोपखाना बन्द करना है।' 'तोप खुशी से लीजिये,' रघुनाथसिंह ने कहा, परन्तु अङ्गरेजी तोपखाने पीछे मिटेंगे, मन्दिर पहले।' गौस ने दृढ़तापूर्वक कहा, 'दूरबीन दीजिये, मुझको मन्दिरो की सन्ध से केवल अङ्गरेजी तोपखाना देखना है। मन्दिरो को मैं देखूंगा ही नही।' रघुनाथसिंह को गुलाम गौस की गोलन्दाजी का भरोसा था दूरबीन और तोप उसके हवाले करदी। गौस ने तोप के ठिये को संभाला, सुधारा और दूरबीन लगाकर निश्चिन्तता के साथ गोला छोड़ा। उसका जो कुछ फल हुआ उसे रघु- नाथसिंह ने दूरबीन से देखा। अङ्गरेज तोपची मारे गये। तोपें नष्ट हो गईं और मन्दिर बच गये। उसी समय गुलाम गौसखा को रानी ने अपनी तौल भर चांदी का तोड़ा पुरस्कार में दिया। जब लालता ने सुना उसका जी गिर गया। सन्ध्या समय बख्शिन के शव का दाह किया गया। बख्शी हर्षोन्मत्त था, परन्तु उसकी आंखो में पागलपन था। कभी कभी वह असंगत और अप्रासंगिक बात कहता था। 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।' और कोई समझा हो या न समझा हो, परन्तु रानी इस महावाक्य को समझती थी। रात हुई। लड़ाई ने कुछ शांति पकड़ी। पीरअली के पास वरहापु- द्दीन पहुंच गया।

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