झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० झाँसी की रानी
‘तो भी वे लोग हमारे गोलन्दाज पर गोलन्दाज़ मार रहे हैं। खैर है कि हमारे यहाँ तोपचियो की कमी नही है वरना झासी का घण्टे भर भी बचना मुश्किल था।’ ‘बारूद कहा बनाई जाती है खासाहब ?’ ‘महल के उत्तर में इमली के पेड़ो के नीचे। आपने क्या नही देखा ?’ ‘नही तो मै उस तरफ नही गया खासाहब।’ ‘एक बात मुझको भी बतलाइये मीर साहब। आप अङ्गरेजी छावनी में पहुच कैसे जाते हैं ?’ ‘कुछ न पूछो खासाहब, गड्ढो, खाइयो और झाड झङ्खाड की आडे लेता हुआ जाता हूँ। ज़रा चूकूँ तो गोली सर पर पड़े। बडी जोखिम का काम है। सीटी का एक बँधा हुआ इशारा करता हूँ। मेरा रिश्तेदार आ जाता है और बाते बतला देता है। मै लौट आता हूँ। फिर वही मुहरी की मुसीबत। इतना बदबूदार कीचड है कि तोबा।’ बरहाम के पैरो में भी कीचड़ लगा हुआ था। पीरअली ने देख लिया। उसने पूछा, ‘खासाहब तुम्हारे पैरो मे कीचड कैसा ?’ उसने भोलेपन के साथ उत्तर दिया, ‘मै भी मुहरी में होकर बाहर थोडी दूर चला गया था। देखता था कि कैसा रास्ता है। आपके जाने के बाद गया और तुरन्त लौट आया।’ पीरअली को सन्देह हो गया। उसने एक निश्चय किया। बरहाम का सन्देह जाग्रत हुआ। उसने भी एक सकल्प किया।