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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

लक्ष्मी बाई ३७१

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सुन्दर को उस रात दूल्हाजू की कुमुक सौंपी गई। उसने दूल्हाजू से गोलन्दाजी सीखी थी, इसलिये वह उसका आदर करती थी। सन्ध्या के उपरान्त सुन्दर ओर्च्छा फाटक के ऊपर दूल्हाजू के पास पहुँच गई। दूल्हाजू ने दिन में खूब तोप चलाई थी। वह प्रसन्न था और सुन्दर उस दिन के काम पर सन्तुष्ट थी, केवल बख्शिन के देहान्त पर कभी कभी मन कसक उठता था। दूल्हाजू ने सुन्दर से कहा, 'आज तो बाई मै बहुत थक गया हूँ। सारा शरीर दुख रहा है।' 'आप विश्राम करिये। मै तो रात भर सावधान रहूँगी।' 'दिन भर फिर वही सब करना पडेगा।' 'मै दिन में भी आपकी जगह काम करती रहूगी।' 'और कल रात?' 'रात को भी काम कर दूंगी। तब तक आप सुस्ता लेंगे। परसो दिन में आप तोपखाना सँभाल लेना। मैं सो लूंगी। रात का काम फिर पकड़ लूंगी।' 'सुन्दर तुम बहुत प्रबल हो।' आपकी कृपा।' 'और अत्यन्त सुन्दर।' 'इसका उत्तर कुछ नही दे सकती। भगवान ने जैसा बनाया वैसी हूँ।' 'तुमको देखते ही, तुम्हारे दर्शन करते ही न जाने मेरा चित्त कैसा हो जाता है। तुम तो महले की रानी होने के योग्य हो।' 'रानी तो एक ही हैं—और एक ही हो सकती हैं।' 'सुन्दर मै तुमको अपने हृदय से लगाना चाहता हू। क्या कहती हो?' 'यही कि आप बहुत नीच हैं।' दूल्हाजू इस उत्तर की आशा नही कर रहा था। उसने अपनी ठेस को मुश्किल से सँभाला। उत्तेजित हुआ।