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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

३७२ झाँसी की रानी बोला, 'जानती हो मै ठाकुर हू ।' सुन्दर ने दृढ सुहावने स्वर में कहा, 'जानते हो मै कुराभी हूँ, जिस जाति की सहायता से छत्रपति ने एक छत्र राज्य स्थापित किया था।' दूल्हाजू यकायक हँस पड़ा। बोला, 'मै सुन्दर बाई तुमसे परम प्रसन्न हुआ। मैने तुम्हारी परीक्षा लेने के लिये ही यह सब कहा था।' सुन्दर ने स्थिरता के साथ कहा, 'हर्ष है कि आपकी परीक्षा शीघ्र समाप्त हो गई।' दूल्हाजू की आँख से लौ छूट पड़ी, परन्तु सुन्दर ने नही देखा। 'तोपखाना सँभालो,' दूल्हाजू बोला, 'मै सबेरे काम पर आ जाऊँगा।' और अधिक वह कुछ न कह सका। चला गया। अब सुन्दर का क्षोभ जाग्रत हुआ। खीझ कर उसने अपने मन में कहा, 'दो जूते मुह पर न लगा पाये। बडा सरदार बना फिरता है। मेरे स्त्रीत्व को इतना दुर्बल समझा !' सबेरा होते ही दूल्हाजू अपने ठिये पर आ गया। सुन्दर से कोई बात नही हुई उसने ऐंठ के मारे क्षमा प्रार्थना तक नही की। सुन्दर ने रात का सब हाल रानी को सुनाया। रानी ने सुन्दर को वर्जित किया, 'और किसी से कुछ मत कहना। गोलन्दाज बहुत मारे गये हैं। यदि मेरे पास काफी आदमी होते तो दूल्हाजू को अपने हाथ से कोडे लगाती और झांसी बाहर कर देती, परन्तु इस समय ज़रा सह लेना चाहिये। तुझे अनुमति देती हूँ कि यदि वह फिर कोई बेहूदी बात कहे तो अकेले में जूते लगा देना। तू उसको कुश्ती मे पछाड़ सकती है।' सुन्दर को अच्छा लगा। चुप रही। रानी ने समझा कि इतने से सन्तुष्ट नही हुई। उन्होने दूल्हाजू को बुलाया और अकेले में काफी डांटा फटकारा।