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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

लक्ष्मीबाई ३७३ कहा, 'अबकी बार तुमको क्षमा किया । अपना काम करो । ऐसा ओछापन न करना ।' दूल्हाजू काम पर शीघ्र लौट गया । उसने सोचा, 'एक ने नीच कहा, दूसरी ने ओछा । मेरे सच्चे प्रेम को किसी ने न पहिचाना । सुन्दर एक छोटी जाति की स्त्री है । मैं उसको खुल्लम खुल्ला रख लेता । ठकुराइन बन जाती । लेकिन बडी पाजी औरत है और रानी औरतो की तरफदार । मैने कहा ही क्या था ? विश्वास दिलाया कि उसकी परीक्षा कर रहा था, परन्तु रानी ने विश्वास नही किया । इस प्रकार का बर्ताव तो बडे बडे महाराज भी मेरे साथ नही कर सकते ।' दूल्हाजू उस बर्ताव को अपना अपमान समझता था । वह उस पहर अपना कर्तव्य, शिथिलता और अन्यमनस्कता के साथ करता रहा । कुशल यही थी कि पिछले दिन गुसाइयो के मन्दिरो के पास वाले तोपखाने के मिट जाने के कारण और रोज के पश्चिमी मोर्चे पर अधिक जोर देने के कारण, ओर्छा फाटक ने अधिक गोलाबारी का आवाहन नही किया । दोपहर के बाद धूप कडी हो गई । लू भी चल उठी । दोनो ओर के तोपखाने और सिपाही अवकाश लेने लगे । पीरअली दूल्हाजू के पास आया । रामरहीम होने के उपरान्त बात चीत होने लगी । पीरअली चाहता था कि कम से कम एक सरदार को अपने पक्ष में कर लू । पीरअली — 'दीवान साहब आपको तो बडा कडा परिश्रम करना पडता है आपकी वजह से मेरी खिडकी पर दुश्मन कोई दबाव ही नही डाल पाता । दूल्हाजू — 'परिश्रम तो, सचमुच, मीर साहब मुझको बहुत करना पडता है । मारे जाने पर मेरे परिश्रम का कोई मूल्य आका जायगा या नही इसमें सन्देह है ।'