भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३७४ झाँसी की रानी पीरअली—'रानी माहब तो इनाम खुले हाथ देती हैं । गुलाम गौस को सोने के कडे, अपनी तौल भर चांदी का तोडा और कुंवर का खिताब बख्शा है ।' दूल्हाजू—होगा । रानी पठानो और परदेसियो की केवल हेकडी पर ही प्रसन्न हो जाती हैं । खजाना उनके हाथ में है चाहे जिसको लुटावे । मै कितनी बार ओर्छा फाटक के सामने से अङ्गरेजो को हटा चुका हूँ, कितनी बार मैने उनके तोपखाने नष्ट किये, परन्तु मुझको तो एक पैसा भी पुरस्कार में नही मिला । जी चाहता है कि यह लड़ाई समाप्त हो या अवसर मिले तो अपने घर चला जाऊँ । पीरअली—'मैं ही, देखिये दीवान साहब, जासूसी मे कितनी जान खपा रहा हूँ । पता लगाने के लिये रात में इधर उधर अकेला भटकता हूँ । एक गोली, या तलवार का वार पड जाय कि बस खतम हू, मगर कोई पूछने वाला नही कि भैया तुम्हारा क्या हाल है । मेरे साथ एक गंवार पठान को और जोड दिया है । उसके मारे परेशान रहता हू ।' दूल्हाजू—'इधर मेरी भी यही परेशानी है । सुन्दर बाई मेरी नायबी में है । उसकी केवल परीक्षा लेने के लिये एक बात कही कि वह पाजी- पन पर आगई । मैने डाटा । उसने रानी से मेरी शिकायत कर दी । रानी ने मुझसे ऐसी बाते की हैं आज, कि दिल टूट रहा ।' पीरअली ने प्रयत्न किया अपने को रानी का जासूस प्रकट करने का, दूल्हाजू ने प्रयास किया अपने को दुखाया सताया निर्दोष सिद्ध करने का, दोनो के मन परस्पर निकट आये, परन्तु एक दूसरे की बात को उनमें से किसी ने नही समझा । दूल्हाजू ने कहा, 'मुझे दिखता है कि हम लोग अङ्गरेज़ो को हरा नही सकेंगे ।' पीरअली—'उन्होने दिल्ली और लखनऊ को सहज ही तोड लिया । कानपुर को भी पराजित कर लिया है । सच्ची बात तो दीवान साहब यह है कि झासी विचारी का कोई बिरता नही ।'