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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 386

लक्ष्मीबाई ३७५ दूल्हाजू -'जी चाहता है कि आज ही इस्तीफा देकर, तुम्हारी मुहरी से घर चला जाऊँ।' पीरअली—'इस्तीफा देने की क्या जरूरत ? वैसे ही चले जाइये, परन्तु चारो तरफ तार लगे हुये है और सन्त्रियो के छबीने पड़े हुये हैं। जिनमे होकर छिपकर निकलना कठिन है।' दूल्हाजू—'आप मीर साहब, अङ्गरेजी छावनी में से खबर कैसे लेते हैं ?' पीरअली—'छावनी में मेरे कुछ रिश्तेदार भोपाली दस्ते में हैं। उनकी मदद से पहुँच जाता हूँ। और वहा का हाल ले आता हूँ—और— और दीवान साहब, में अङ्गरेज़ो के बड़े जनरल रोज साहब के सामने भी हो आया हू।' दूल्हाजू—'आप लडाई शुरू होने के पहले गये थे ?' पीरअली—'नही कल रात को ही तो पहुँचा था।' दूल्हाजू—'फिर बचे कैसे ?' पीरअली—'सीधी सी बात । उनसे कह दिया कि मैं तो आपकी तरफ से जासूसी कर रहा हू।' दूल्हाजू—'जनरल मान गया ?' पीरअली—'क्यो न मानता ? दो एक बाते बतलादी, उसको भरोसा हो गया । दूल्हाजू—'मैं भी जनरल के पास चलना चाहता हूँ।' पीरअली—'यदि रानी साहब को खबर लग गई तो ?' दूल्हाजू—तो जो हाल आपका होगा, वही मेरा भी।' पीरअली—'मैं तो जासूस हू।' दूल्हाजू—'मुझको भी उसी रंग में रंग लीजिये।' पीरअली—'मगर जनरल के सामने आप अपने को जासूस नही कह सकेंगे।' ε