भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

३७६ झाँसी की रानी दूल्हाजू---'तब क्या कहूँगा ? जाना तो उसके सामने अवश्य चाहता हूँ । शर्त यह है कि बचकर लौट आऊँ और यहा भी कोई गडबड न हो ।' पीरअली—'जनरल ने यदि आपसे किसी काम के करने के लिये कहा तो ?' दूल्हाजू—'हा करनी पडेगी ।' पीरअली—'तो पहले हमारा आपका ईमान हो जाय और कही भी किसी प्रकार भी बात न फूटने पावे ।' पीरअली ने दीन की और दूल्हाजू ने धर्म की पक्की सौगन्ध खाई । पीरअली ने कहा, 'यदि अवसर मिला तो आज रात को, नही तो कल रात को चलेगे ।' दिन भर पश्चिमी और दक्षिणी मोर्चा पर घोर युद्ध होता रहा । उत्तर में, उनाव, भाडेरी और सूजेखा फाटको पर भी गोलाबारी हुई । इस दिशा मे ओर्च्छा की सेना रोज के दस्ते के साथ काम कर रही थी, परन्तु इस ओर झासी के सैनिक और गोलन्दाज ऐसी मुस्तैदी के साथ कर्तव्य पालन कर रहे थे कि रानी को इस दिशा से अङ्गरेजो का कोई भय ही न था । दतिया राज्य से अङ्गरेजो की सहायता के लिये कोई दस्ता नही आया था । इस राज्य को चरखारी-पराजय का पता लग गया था । राजा विजय बहादुर का देहान्त हो चुका था । उत्तराधिकारी नाबालिग था । रोज़ के आक्रमण के पहले दतिया को रानी का भय था और अब तात्या टोपे का । इसलिये दतिया राज्य भय-ग्रस्त तटस्थता में था । झाँसी का दतिया फाटक निर्भय था । किले की पश्चिमी बुर्ज का तोपखाना इसकी काफी रक्षा किये हुये था । यही हाल खडेराव फाटक का था । फिर भी इन फाटको के तोपची हाथ पर हाथ धरे न बैठे थे । सध्या हो गई । परन्तु रात में गोलाबारी बन्द न हुई । रात में गोले सर्राती हुई छोटी छोटी लाल गेदो की तरह मालुम पडते थे । इस गोला- बारी से शहर का थोडा सा नुकसान हुआ, परन्तु किले का कुछ नही