भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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बिगडा । उस रात पीरअली बाहर नहीं जा पाया । दूल्हाजू कम सोया । उसने पीरअली की बाट जोही । दिन निकलने पर फिर जोर का युद्ध हुआ । अब तक गोरी पल्टनें आगे बढ बढकर मर रही थीं । अब अधिकांश देशी पल्टने दिखलाई पडी । परन्तु तोपखाने सब अङ्गरेजो के हाथ में थे । दोनो ओर के तोपची मर रहे थे और दूसरे तोपची उनकी जगह, पर आ रहे थे । संध्या के समय किले के पश्चिमी मोर्चे का तोपखाना बन्द हो गया, कारण था दीवार का धुस्स हो जाना । दीवार के टूट जाने से तोपखाना दिखलाई पडने लगा । मुश्किल से तोपो को आड़ में किया गया । पर पहाडी की ओर से एक दस्ता झपटा । खंडेराव फाटक पर से सागरसिंह ने देख लिया । फाटक पर ताले पड़े, थे । वैसे भी फाटक खोलने की आज्ञा न थी । सागरसिंह ने तोप चलाई, परन्तु वह जल्दबाज़ था, इसलिये निशाना ठीक न बैठता था । खीज उठा । अपने साथियो से बोला, 'आज बुन्देलो की नाक कटती है और कुँवर सागरसिंह की मूँछ जाती है । जो मेरे साथ इन गोरो का सामना कर सके वह तुरन्त नीचे उतरे ।' एक ने कहा, 'रानी साहब की या दीवान जवाहरसिंह की आज्ञा ले लो ।' सागरसिंह ने उत्तर दिया, 'बावले हुये हो ? जब तक किसी की आज्ञा आवेगी तब तक ये लोग किले में घुस जायेगे । तब उस आज्ञा को क्या हम चाटेगे ?' रस्से की सीढ़ी लगाकर धडाधड सौ आदमी नीचे उतर गये । सबसे पहले सागरसिंह । ये लोग सपाटे से बगल वाली टोरिया की ओट में पहुंच गये । जैसे ही अंग्रेजी दस्ता आया इन लोगो ने बन्दूको की बाढ छोडी । दस्ते ने भी बन्दूक दागी । सागरसिंह की टुकडी को कोई हानि नही हुई, परन्तु अङ्गरेजी दस्ता छिन्नभिन्न हो गया । इकट्ठा होने ही को था कि सागरसिंह अपने साथियो सहित तलवार लेकर पिल पड़ा । अङ्गरेजी