भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

३७८ झांसी की रानी दस्ता सब नष्ट हो गया । कुँवर सागरसिंह भी खंडेराव फाटक के पास ही मारा गया । उसके कुछ आदमी बच गये । भीतर वापिस आ गये । इन आदमियो की वीरता ने उस दिन झांसी का किला बचा लिया।

  • रात हो गई । रानी को सागरसिंह के शौर्य का समाचार मिल गया । रानी की आखो के सामने बरुआसागर की घटना का पूरा चित्र खिंच गया । रानी ने मन मे कहा, 'जिस देश में सागरसिंह सरीखे लोग जन्म लेते हैं वह स्वराज्य से बहुत दिनो वंचित नही रह सकता ।' रानी ने दीवार की मरम्मत अपने सामने करवाई । कारीगर कम्बल ओढ़ कर दीवारों की मरम्मत पर चिपट गये और रात भर में दीवार ज्यो का त्यो कर लिया । सवेरे पश्चिमी अंग्रेजी मोर्चे ने दूरबीन से देखा-जैसे दीवार का कभी कुछ बिगडा ही न था ! उस दिन अत्यन्त भीषण युद्ध हुआ । दोनो ओर निरन्तर और तीव्र गोलाबारी हुई । इधर दीवारे टूट रही थी । उधर अंग्रेजो के मोर्चे नष्ट हो रहे थे । इधर तोपची पर तोपची मारे जा रहे थे, उधर तोपखानो पर तोपखाने बन्द हो रहे थे । तुरन्त दूसरी तोपो को सँभाल लेते थे । रानी की स्त्री सेना इस तरह काम कर रही थी जैसे देवी दुर्गा ने अनेक शरीर और अनेक रूप धारण कर लिये हो । दीवार टूटी कि मरम्मत हुई । वह भी दिन दहाडे । मरम्मत करने का काम पुरुष कर रहे थे और पत्थर तथा चूना इत्यादि देने का काम स्त्रियाँ । गोले बरस रहे थे । ऐसे गोले जो फटकर अपने भीतर के कील काटे चारो ओर सनसना देते थे, परन्तु न तो झासी की हिम्मत टूट रही थी और न झांसी की रानी की । जैसे जैसे संकट बढता, तैसे तैसे इनका साहस बढता जाता ! यकायक गोला किले के भीतर वाले गणेश मन्दिर पर गिरा और वह ध्वस्त हो गया । केवल मूर्ति बची । दूसरा शंकर किले में गिरा । उस