झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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सवेरा होते होते रानी भांडेर के नीचे बहने वाली पहूज नदी के किनारे पहुँच गई । तुरन्त नहाया धोया, दामोदरराव को कलेवा करवाया । उनके साथियो ने भी थोडा-सा जलपान किया । रानी के केवल कुछ अञ्जली पानी पिया । झासी की दुर्दशा और अपने स्नेहपात्रो के मारे जाने के कारण, उनका कलेजा इतना भरा हुआ था कि कलेवा के नाम से उनको अरुचि हुई । अन्तिम अञ्जनी का पानी मुह में डाला था कि झासी की ओर से धूल उडती हुई दिखाई पडी । रानी ने समझ लिया कि पीछा करने वाले लोग आ रहे हैं । गुलमुहम्मद ने दूरवीन से देखा । बोला, ‘ये अङ्गरेज लोग अमारा इधर वी पिच्छा करता है । हुजूर आगे वढें । अम लोग देखता है ।’ ‘नही,’ रानी ने कहा, और झटपट दामोदरराव को पीठ पर कसा, घोडे पर सवार होकर बोली । ‘इस तरह हम लोग बीन बीनकर मारे जायेगे । यहा आसपास छोटो छोटी टोरिया हैं । इनके पीछे खड़े हो । जैसे ही वैरी का दस्ता निकट आवे पिस्तौलें दागो । दस्ता बन्दूक या पिस्तोल से जवाब देगा, जवाब चुकने पर तुरन्त तलवार से आक्रमण करो ।’ गुलमुहम्मद ने समझ लिया—थोड़े से आदमियो को लेकर रानी कितने वडे दस्ते का मुक़ाबला कर सकती हैं ! रानी की टोली ने उसी आदेश के अनुसार काम किया । लैफ्टिनेट बोकर का दस्ता घुडसवारो का था । ठोस पात में वे लोग घोड़े दौडाते हुये चले आ रहे थे । जैसे ही पिस्तौल की मार में आये रानी की टोली ने आड से पिस्तोलो की बाढ दागी । वाढ का भयंकर प्रभाव हुआ । बोकर के दल के पास पिस्तोले और बन्दूकें भी थी, परन्तु बन्दूके श्रावरो में पडी हुई थी । उन्होने घबराकर पिस्तोलें खाली कर दी । रानी ने तुरन्त तलवार से हमला किया । अँग्रेज दस्ते के दो दो तीन तीन