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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४२६ सवार रानी के साथियो के पल्ले पडे। एक सवार को तो रानी ने कमाल की सवारी करके घोडे समेत चीर दिया। बोकर रानी के ऊपर घोडे को जोर की एड लगाकर लपका। रानी ने विलक्षण चतुरता के साथ अपने घोडे को पीछे हटाकर बोकर के सपाटे को व्यर्थ कर दिया। फिर वह उस पर झपटी और तलवार का वार किया। बोकर घायल होकर गिरा। शेष दस्ता अपने प्राण लेकर भागा। रानी पर भागते हुये सवारो में से एक ने गोली चलाई। रानी बच गयी, गोली घोडे का पिछला हिस्सा छीलती हुई चली गई। रानी की गाठ में अब केवल सुन्दर, गुलमुहम्मद, देशमुख और रघुनाथसिंह बचे—बाकी सब मारे गये। परन्तु इन बहादुरो ने बोकर के दस्ते को कुंठित कर दिया, लौटा दिया। बोकर को उसके सगी झासी उठा ले गये। उसके लौटने पर रोज को झलकारी के कृत्य का पूरा मर्म और अच्छी तरह समझ में आ गया। रानी पहूज पार करके कालपी की ओर तेजी के साथ चल पडी। मार्ग में उनका प्यारा घोडा यकायक रुका। उसके घाव से बहुत खून निकल चुका था, और उसको दिल तोड परिश्रम करना पडा था। मर गया। एक गाव वाले ने उनको अपना अच्छा घोडा दे दिया। रानी केवल पानी पीती हुई आधीरात के लगभग कालपी पहुँची। एकसौ दो मील का मार्ग तय करके। दिन भर कुछ भी न खाकर उस तेज धूप में इस पर भी पहुँचते ही उन्होने काशीबाई और जूही के सम्बन्ध में तात्या से प्रश्न किया। तात्या ने उत्तर दिया, 'काशीबाई झासी के संग्राम में मारी गई। जूही बच गई। इस समय वह शिविर में रावसाहब के रनवास के साथ है। आज्ञा हो तो बुलवाऊ ?' 'नही' रानी ने निषेध किया, 'कल सध्या समय मिलूँगी।' इसके उपरान्त तात्या ने सविस्तार अपनी झासी वाली लडाई का वृत्तान्त थोडे ही समय में सुना दिया। उन्होने धैर्य के साथ सुना।