झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४३ . केवल एक स्थान वध से बचा । वह था बिहारीलाल जी का मन्दिर । कदाचित इस कारण कि वह एक कोने में था और उस पर कोई शिखर न था । आरम्भ के कत्ल के बाद कुछ लोग माधवराव भिढे के बाग में आ छिपे । एक अंग्रेज़ अफ़सर के हृदय के किसी कोने मे कुछ मानवता बाकी थी । उसने इन लोगो का वध नही होने दिया । इस बाग की चौडी दीवारे पोली थी । पूना के पास का एक शास्त्री उन दिनो अपने दुर्भाग्य से झाँसी में आ फँसा था । वह दीवार की एक खोल मे रात भर ठुसा रहा । पीठ से पीठ सटा कर वही एक स्त्री भी प्राणो की खैर मनाती रही । समय पाकर शास्त्री किसी प्रकार अपने निवास स्थान पर पहुचा । तमाखू खाने की आदत थी, पर लुटेरे घर में से उसे भी गत दिवस की लूट में उठा ले गये थे । उसी समय कुछ मदरासी दस्ते वाले फिर घुस आये । उन्होने बचे खुचे बर्तन भी खसोटे । शास्त्री ने भी अपनी एक ज़रूरत पूरी की । लुटेरो से कहा, 'थोडी खाने की तमाखू हो तो दिये जाओ ।' बर्तनो के बदले में थोडी सी तमाखू मिल गई ! विदेशी होते तो शायद खाने को संगीन मिलती । रोज का एक दस्ता घूमता भटकता, टक्करें लेता देता मऊरानीपुर होकर निकला । झाँसी के पतन का समाचार पाने पर भी काशीनाथ भैया और आनन्दराय इस दस्ते से भिड गये । मऊ की गढी छोटी सी थी । तोपे गाँठ में न थी । इसलिये ये लोग अपना छोटा सा बन्दूकची दल लेकर मऊ के बाहर की टौरिया की आड में पहुचे और मुकाबला किया । खूब डटकर लडे और सब मारे गये । आनन्दराय का लडका भी साथ था । मरने के पहले आनन्दराय ने लडके से कहा, 'यदि कभी रानी साहब के दर्शन हो, तो कहना कि मऊ झाँसी से पीछे नही रही ।'