भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४३ . केवल एक स्थान वध से बचा । वह था बिहारीलाल जी का मन्दिर । कदाचित इस कारण कि वह एक कोने में था और उस पर कोई शिखर न था । आरम्भ के कत्ल के बाद कुछ लोग माधवराव भिढे के बाग में आ छिपे । एक अंग्रेज़ अफ़सर के हृदय के किसी कोने मे कुछ मानवता बाकी थी । उसने इन लोगो का वध नही होने दिया । इस बाग की चौडी दीवारे पोली थी । पूना के पास का एक शास्त्री उन दिनो अपने दुर्भाग्य से झाँसी में आ फँसा था । वह दीवार की एक खोल मे रात भर ठुसा रहा । पीठ से पीठ सटा कर वही एक स्त्री भी प्राणो की खैर मनाती रही । समय पाकर शास्त्री किसी प्रकार अपने निवास स्थान पर पहुचा । तमाखू खाने की आदत थी, पर लुटेरे घर में से उसे भी गत दिवस की लूट में उठा ले गये थे । उसी समय कुछ मदरासी दस्ते वाले फिर घुस आये । उन्होने बचे खुचे बर्तन भी खसोटे । शास्त्री ने भी अपनी एक ज़रूरत पूरी की । लुटेरो से कहा, 'थोडी खाने की तमाखू हो तो दिये जाओ ।' बर्तनो के बदले में थोडी सी तमाखू मिल गई ! विदेशी होते तो शायद खाने को संगीन मिलती । रोज का एक दस्ता घूमता भटकता, टक्करें लेता देता मऊरानीपुर होकर निकला । झाँसी के पतन का समाचार पाने पर भी काशीनाथ भैया और आनन्दराय इस दस्ते से भिड गये । मऊ की गढी छोटी सी थी । तोपे गाँठ में न थी । इसलिये ये लोग अपना छोटा सा बन्दूकची दल लेकर मऊ के बाहर की टौरिया की आड में पहुचे और मुकाबला किया । खूब डटकर लडे और सब मारे गये । आनन्दराय का लडका भी साथ था । मरने के पहले आनन्दराय ने लडके से कहा, 'यदि कभी रानी साहब के दर्शन हो, तो कहना कि मऊ झाँसी से पीछे नही रही ।'