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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 526 में से

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पृष्ठ 446

लक्ष्मी बाई ४३३ [ ७६ ] कालपी खासा नगर था । यमुना नदी के किनारे । एक और मजबूत किला । तीन ओर परकोटा, और चौथी ओर यमुना नदी । किले के पश्चिम की तरफ एक मैदान, उसके बाद नगर । नगर से कुछ दूर चौरासी गुम्बज का क्षेत्र । छत्रसाल के पीछे कालपी का भूखंड गोविन्दपन्त के अधिकार में आया। सन् १८०६ की सन्धि के द्वारा अंग्रेजो ने गोविन्दपन्त के वंशजो से कालपी को पाया । सन् १८२५ में इसी वंश के एक नाना पंडित ने कालपी को फिर अपने हाथ में कर लिया, परन्तु झाँसी के राजा रामचन्द्रराव की सहायता से अंग्रेजो ने कालपी को वापिस ले लिया । सन् १८५७ के विप्लव में कालपी की छावनी ने कानपुर से आये हुये विप्लवकारियो का साथ दिया । थोड़े समय उपरान्त रावसाहब अपनी सेना यहा लेकर आगया और कालपी-नगर विल्पकारियो का एक प्रधान अड्डा बन गया । जब रानी कालपी पहुँची रावसाहब-नाना का भाई-और तात्या वही थे । दूसरे दिन रानी की इन लोगो से भेट हुई रानी का इन लोगो ने जी खोलकर आदर सत्कार किया । परन्तु रानी आदर की भूखी न थी । वे काम चाहती थी । लेकिन वह कालपी में अस्तव्यस्त था । तात्या सरीखे उत्कृष्ट सेनापति के होते हुये भी सेना का प्रबन्ध अव्यवस्थित था । कारण तात्या का एक स्वभाव- गत दोष था--वह था रावसाहब को अपने तनमन का सम्पूर्ण स्वामी मानना और अपने सैनिको के व्यसनो को क्षमा करते रहना । रावसाहब का और सैनिको का, वह अत्यन्त स्नेहभाजन था, परन्तु इससे सेना की अनुशासनहीनता की पूर्ति नही हो सकती थी । रानी की सूक्ष्म दृष्टि ने इस बात को शीघ्र देख लिया । विश्राम करने के बाद सन्ध्या समय रानी उन लोगो से मिली ।

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