झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ झाँसी की रानी
रानी ने सेना के अनुशासन, क़वायद-परेड और युद्ध सामग्री इत्यादि प्रसङ्गो पर प्रश्न किये । सिवाय युद्ध सामग्री के और सब प्रसङ्गो पर उनको असन्तोषजनक उत्तर मिले । रानी ने अन्त में कहा, 'बहुत कसर है, रावसाहब ।' राव जल्दी से बोला, 'सब ठीक हो जायगा बाईसाहब, शीघ्र सब ठीक हो जायगा । इन्ही सिपाहियो और इसी तात्या ने तीन वडे बड़े जनरलो को हराया और बहुतसों को छकाया ।' 'चौथा भी हराया जा सकता था' रानी ने कहा, 'परन्तु हमारी ओर से एक अनिवार्य गलती हुई ।' तात्या उनके मुँह की ओर देखने लगा । रानी बोली, 'उस दिन मेरे गोलन्दाजो ने भरपूर गोलाबारी न करने की सम्मति दी और मैने मान ली । एक भय था भी—कही हमारे किले की गोलाबारी से आपकी सेना नष्ट न हो जाय । फिर भी चूक हुई । यह मानना पड़ेगा ।' तात्या ने कहा, 'उस दिन आपकी सेना को कोट के बाहर निकलकर अङ्गरेजी सेना पर छापा मारना था ।' 'टौरियो की ओट पड़ जाने से कालपी की सेना अदृश्य हो गई,' रानी बोली, 'मालूम नही पड़ता था कि किस ओर से प्रकट होगी । फिर सन्ध्या हो गई और प्रतीत हो गया कि कालपी की सेना लौट गई, और झाँसी अकेली रह गई ।' रावसाहब ने कहा, 'अब सब ठीक हो जायगा बाईसाहब । आप कुछ चिन्ता न करे । नाना साहब लखनऊ की ओर प्रयत्नशील हैं । वानपूर और शाहगढ के राजा तथा बादा के नवाब ससैन्य शीघ्र कालपी आ रहे हैं । हम लोग यहा योजना तैयार कर के, फिर कानपुर और झासी को हस्तगत करेगे ।' सन्ध्या समय रानी को जूही मिली । वह फूट-फूटकर रोई । रानी ने शान्त किया । समझाया ।