झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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लक्ष्मीबाई ४३५ 'जूही, तपस्या में क्षय पहले है और अक्षय पीछे। यह युद्ध स्वराज्य की अन्तिम साधना नही है और न हम लोग उसके अन्तिम साधक ।' फिर रानी ने अपने स्त्री-पुरुष वीरो के बलिदानो की कथा सुनाई। जूही ने कहा, 'मोतीबाई के साथ में भी घायल होती तो इसी गोद में प्राण जाते । 'सहज ही प्राण त्याग मत न करो जूही, 'रानी बोली, 'अभी बहुत काम करने को पडा है।' दूसरे ही दिन पेशवा की सेना को व्यवस्थित करने की योजनाये बनानी प्रारम्भ करदी, कुछ कार्यान्वित हुई । अनेक पेशवा की ढील- ढाल में यो ही पडी रही । कालपी की सेना का शिथिल सङ्गठन देखकर रानी का जी दुख दुख जाता था।