झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३६ झांसी की रानी [ ८० ] , अप्रैल के तीसरे सप्ताह मे बानपूर, शाहगढ और बादा की सेनाये कालपी मे आगई । झांसी का कडा प्रबन्ध करके रोज़ ने अप्रैल की पच्चीस तारीख को कालपी पर चढाई की आज्ञा दी । इसी समय उसको खबर मिली कि रानी कोंच होती हुईं झांसी पर फिर आने वाली हैं । रोज़ का एक दस्ता पूँछ पहाडगाव पर पहुचा । विद्रोहियो से कर्री मुठभेड़ हुई । अग्रेजी दस्ता सफल हुआ । फिर एक युद्ध सैदनगर कोटरा पर हुआ । अग्रेजी दस्ता हारा । कोच पर अधिकार करने के लिये रोज़ ने लुहारी के किले को लेने का पहले प्रयत्न किया । कोच में पेशवा की काफी सेना इकट्ठी हो गई । बानपूर और शाहगढ के राजा तथा बादा के नवाब भी यही आगये । पुनः बीस सहस्र सैनिक इकट्ठे हो गये । रानी और तात्या सरीखे सेनापति । किस बात की कमी थी ? जिस बात की कमी थी उसको रानी जानती थी । इस सेना में बहुत से लुटेरे और बदमाश भी इकट्ठे हो गये थे । उनको स्वराज्य या युद्ध में उतनी रुचि न थी जितनी विजय या पराजय के उपरान्त लूट खसोट करने में थी, वे इतने पतित थे कि मौका मिलने पर अपनी ही छावनी को लूट सकते थे । इस सेना में बहुत से तो कवायद परेड ही नही जानते थे और अनुशासन का नाम न सुना था । वे केवल अपने सरदारो का, यां जिन्होने उनको भर्ती किया था उनका, आदेश मानने को तैयार थे । सो भी उतना, जितना उनके मन के अनुकूल होता । रानी का बस चलता तो वे कम से कम आधी सख्या को अपने अपने घर लौटा देती । केवल कल्पना में इस सेना का प्रधान संचालक रावसाहब था । वास्तव में अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग था । पूर्ण सत्ता एक व्यक्ति के हाथ मे न थी । और युद्ध को सफलता-पूर्वक लडने के लिये, सैन्य सचालन एकाधिपत्य चाहता है, वह इस सेना में न था ।