भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 526 में से

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पृष्ठ 450

लक्ष्मीबाई ४३७ उधर रोज ल्हारी के किले को, कोच का पहला मोर्चा समझ कर ले लेने के प्रयत्न में था, इधर कोच में रात को रावसाहब, बानपूर और शाहगढ के राजा तथा बांदा के नवाब की इच्छा नाच देखने को हुई । इन लोगो ने सुना था कि झासी की जूही, जो उस समय कोच में रानी के शिविर में थी, बहुत अच्छा नाचती है । इसलिये भंग पीने के उपरान्त उसके बुलाने का हठ किया गया । रावसाहब को सरूर आ चुका था, परन्तु जवान ढीली नही हुई थी । तात्या को बुलाया । वह भङ्ग नही पिये था । न पीता था । रावसाहब ने कहा, 'आज दिन में बहुत गरमी रही । अब ठण्डक है । सब लोग मजे में हैं । युद्ध पर युद्ध होते रहते हैं । बीच बीच में कुछ आनन्द भी चाहिये ।' तात्या ने खीज को दबा कर निवेदन किया, 'आज्ञा हो ।' 'अरे यार मेरे, बादा,के नवाब ने कहा, 'और आज्ञा होगी ही क्या ? किसी को नाचने गाने के लिये बुला लाओ ।' बानपूर का राजा बोला, 'सरदार साहब, माफ करना आप शंकर की बूटी का सेवन नही करते, इसलिये इस मजे को नही जानते, परन्तु हम लोगो के मन तो बढावे पर, इन्ही कमानो पर आते हैं ।' शाहगढ का राजा जरा और अग्रसर हुआ, 'भाई टोपे साहब, वह जो झाँसी का तुहफा छावनी में है, उसका नृत्यगान कब देखने को मिलेगा ?' तात्या सन्नाटे में आ गया । रावसाहब ने कहा, 'उसका नाम जूही है । बडा सुन्दर नाम है । सिपाहीगरी भी करती है और नृत्यगान भी । झाँसी की नाटकशाला में बढिया अभिनय करती थी । बेढब हाव भाव । जब से यहा आई, उदास बनी रही । मातमसा मानती रही । अब उसकी स्वामिनी आ गई, हैं प्रसन्न है । नाचने गाने को नाही करने का कोई कारण नही । रात भी