भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४३८ झाँसी की रानी

बहुत नहीं गई है। घण्टे आध घण्टे के लिये यह दरबार रसीला रंगीला हो जाय । बुला लाओ ।' तात्या ने माथे का पसीना पोछा । बोला, 'जो आज्ञा, परन्तु रानी साहब—' नवाब -- 'क्यो किन्तु परन्तु क्या ?' रावसाहब—'रानी साहब पूजा मे होगी। बुला भी लाओ ।' तात्या गया । उस मडली का सरूर और बढा । तात्या ने जूही को एकान्त में बुलाया । जूही बहुत प्रसन्न थी । जूही—'सरदार साहब, आपने क्यो कष्ट किया ?' तात्या—'एक बात कहने आया हू ।' जूही--'मै उस बात को सुनने के लिये बरसो से तरस रही हूँ।' तात्या--'एक प्रार्थना करने के लिये आया हूँ।' जूही—'मेरे सरदार मुझमे प्रार्थना करे ! जिस एक शब्द के सुनने के लिये बरसो तपस्या की, अपने तन और मन की रक्षा की, उस एक शब्द के सुनने के लिये, आपकी जूही के भाग्य का आज उदय हुआ, परन्तु--' तात्या—'परन्तु क्या जूही ?' जूही--'परन्तु सरदार साहब, मेरी रानी का स्वराज्य सग्राम पहले सफल हो और मे आपकी जन्म सगिनी बनकर रहूँ । बहुत दिनो से इस बात को कहने के लिये संकल्प पर सकल्प किये, परन्तु आज लाज सकोच त्याग कर कह पा रही हूँ। आपने अवसर देने की कृपा की।' पेशवा के प्रधान सेनापति का सिर नीचा पड़ गया। कुछ क्षण में हिम्मत बाँध कर बोला, मेरी प्रार्थना यह है। मेरी प्रार्थना--' जूही ने टोककर कहा, 'आपके मुँह से प्रार्थना का शब्द नही सुहाता । आज्ञा हो, आपकी जूही का सिर चरणो में पहुँचेगा, परन्तु जिस शर्त का निवेदन कर चुकी हू, वह अटल है।'